7 वर्षीय बच्ची की पीड़ा बनी बहस का केंद्र, SC में बोहरा समुदाय के खतना प्रथा पर सुनवाई

नई दिल्ली

मुस्लिमों के दाऊदी बोहरा समुदाय में छोटी बच्चियों का खतना किए जाने की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को बहस हुई। इस प्रथा पर सवाल उठाते हुए एक दाऊदी बोहरा महिला ने कहा कि इसके तहत बच्चियों के जननांग के एक हिस्से को काटा जाता है। इस दौरान उन्हें बेहद पीड़ा से गुजरना होता है। यह ट्रॉमा ऐसा होता है कि उन्हें पूरी जिंदगी इससे होने वाली शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजरना होता है। उन्होंने कहा कि इस खतना के दौरान हजारों नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। महिला ने कहा कि इससे स्वास्थ्य को खतरा होता है और उनकी गरिमा से भी समझौता है।

महिला ने कहा कि इस प्रथा को तो पॉक्सो ऐक्ट के तहत अपराध घोषित किया जाना चाहिए। दाऊदी बोरा समुदाय की महिला मासूमा रानालवी की ओर से पेश वकील सिद्धार्थ लूथरा ने चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा कि खतना की यह प्रथा 7 साल की बच्चियों के साथ होती है। उन्होंने कहा कि जब 7 साल की बच्ची के साथ इसे अंजाम दिया जाता है तो फिर सहमति का तो सवाल ही नहीं उठता है।

उन्होंने कहा कि बच्ची की सहमति की बात नहीं हो सकती और उसके परिजन सामाजिक दबाव में रहते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि वे विरोध करेंगे तो उनके सामाजिक बहिष्कार का खतरा रहता है। लूथरा ने कहा कि परिजन चुप रहते हैं क्योंकि यदि उनका बहिष्कार हुआ तो फिर वे ऐसी स्थिति में आ जाते हैं, जहां उनको समाज से बॉयकॉट झेलना पड़ा है। समाज के साथ उनके आर्थिक और सामाजिक रिश्ते खत्म हो जाते हैं। लूथरा ने कहा कि इस विषय को भले ही सामाजिक प्रथा कहा जा रहा है, लेकिन जिस तरह से एक बच्ची को पीड़ा झेलनी पड़ती है वह मामला संवैधानिक और आपराधिक दायरे में चला जाता है। ऐसे में इस पर उसी आलोक में विचार किया जाना चाहिए।

जज ने जताई हैरानी- अब तक कोई कानून क्यों नहीं बना
इस मामले की सुनवाई करने वाली बेंच में चीफ जस्टिस सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार समेत 9 जज शामिल हैं। इस केस की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने हैरानी भी जताई कि आखिर इसके खिलाफ कोई कानून क्यों नहीं बना है। उन्होंने कहा कि इस तरह से बच्चियों का जो खतना होता है, उससे उनके अंग प्रभावित होते हैं। ऐसे में कोई कानून जरूर बनना चाहिए, जिससे इस पर रोक लग सके। अदालत ने कहा कि ऐसे मामले में कानून बनाकर रोक लगाने का अधिकार तो सरकार के पास ही है।

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