76 दिन बाद बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, लेकिन भारत अब भी राहत में! समझें 4 साल का पूरा हिसाब-किताब

नई दिल्ली

देश में मई 2026 में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तीन बार संशोधन किया गया- 15 मई, 19 मई और 23 मई को. सरकारी सूत्रों के अनुसार, इन तीनों चरणों के बाद कुल मिलाकर पेट्रोल 4 रुपये 74 पैसे और डीजल 4 रुपये 82 पैसे प्रति लीटर महंगा हुआ. CNG की कीमत भी 1 रुपये प्रति किलो बढ़ाई गई. यह लगभग चार वर्षों में पहली बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है. लेकिन इस बढ़ोतरी को समझने के लिए उसका पूरा संदर्भ देखना जरूरी है। 

कंज्यूमर्स ने नहीं सरकार ने खुद उठाया बोझ
28 फरवरी 2026 को होर्मुज संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय
बाजार में कच्चे तेल की कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. इतनी बड़ी वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद भारत में 76 दिनों तक पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ाए गए. इस दौरान तेल कंपनियां रोजाना करीब 1000 करोड़ रुपये का घाटा खुद वहन करती रहीं. 27 मार्च 2026 को केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल दोनों पर SAED यानी एक्साइज ड्यूटी में 10-10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की. डीजल पर केंद्रीय ड्यूटी शून्य हो गई. इस फैसले से सरकार को इस वित्त वर्ष में लगभग 30,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ. यानी यह बोझ सीधे उपभोक्ता पर नहीं डाला गया, बल्कि सरकार ने खुद उठाया। 

साथ ही सरकार ने डीजल पर 21 रुपये 50 पैसे और ATF पर 29 रुपये 50 पैसे प्रति लीटर एक्सपोर्ट लेवी लगाई, ताकि देश में तैयार तेल विदेश न जाए और घरेलू बाजार में आपूर्ति बनी रहे। 

19 मई को सरकार ने माना कि दो चरणों की बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियों का दैनिक घाटा 1000 करोड़ से घटकर 750 करोड़ रुपये रह गया था. 23 मई की तीसरी बढ़ोतरी के बाद भी बड़ा हिस्सा तेल कंपनियां खुद वहन कर रही हैं। 

अब वैश्विक तुलना देखिए.
होर्मुज संकट के बाद म्यांमार में पेट्रोल लगभग 90%, मलेशिया में 56%, पाकिस्तान में 55%, अमेरिका में 44%, फिलीपींस में 40%, श्रीलंका में 38%, फ्रांस में 21% और ब्रिटेन में 19% तक महंगा हुआ. भारत में यह बढ़ोतरी केवल लगभग 5% रही। 

सऊदी अरब ने दाम नहीं बढ़ाए क्योंकि वह स्वयं बड़ा तेल उत्पादक देश है और सीधे सब्सिडी देता है. उसे छोड़ दिया जाए तो भारत दुनिया में सबसे कम बढ़ोतरी करने वाले देशों में रहा. यह पहली बार नहीं है जब वैश्विक संकट के दौरान भारत ने उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश की हो। 

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान, जब पूरी दुनिया में ईंधन महंगा हो रहा था, तब भारत ने नवंबर 2021 और मई 2022 में पेट्रोल 8 रुपये और डीजल 6 रुपये प्रति लीटर सस्ता किया था. G20 देशों में भारत अकेला देश था जिसने उस दौर में पेट्रोल-डीजल की कीमतें घटाई थीं। 

अब सवाल आता है कि अलग-अलग राज्यों में कीमतें अलग क्यों हैं?
केंद्र की एक्साइज ड्यूटी पूरे देश में समान रहती है, लेकिन हर राज्य अपनी तरफ से अलग VAT लगाता है. यही वजह है कि पंप पर कीमतें अलग दिखती हैं. 23 मई 2026 के बाद आंध्र प्रदेश में पेट्रोल लगभग 117.80 रुपये, तेलंगाना में 115.70 रुपये और केरल में 112.30 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया, जबकि गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में यह करीब 99.50 रुपये के आसपास रहा. आंध्र प्रदेश में VAT लगभग 31% है, जिसके साथ अतिरिक्त रोड डेवलपमेंट सेस भी लगाया जाता है. इससे प्रभावी कर दर करीब 35% तक पहुंच जाती है। 

सरकारी पक्ष का दावा है कि जिन दलों ने केंद्र से एक्साइज कम करने की मांग की, उनके शासन वाले कई राज्यों में VAT सबसे अधिक बना रहा. 27 मार्च की एक्साइज कटौती के बाद BJP शासित राज्यों ने पूरी राहत उपभोक्ताओं तक पहुंचाई, जबकि कांग्रेस और INDIA ब्लॉक शासित राज्यों ने VAT में समान कटौती नहीं की. इसलिए इन राज्यों में अंतिम कीमतें अपेक्षाकृत अधिक बनी रहीं। 

अब 2014 के '71 रुपये वाले पेट्रोल' की चर्चा.
कांग्रेस अक्सर कहती है कि 2014 में पेट्रोल 71 रुपये था और अब लगभग 98 रुपये है. लेकिन सरकारी पक्ष के अनुसार उस समय कीमतें कम रखने के लिए 2005 से 2010 के बीच लगभग 1.34 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड जारी किए गए थे। 

यह सीधे सरकारी उधार थे, जिनका भुगतान बाद की सरकारों और करदाताओं को करना पड़ा। 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार:
FY 2021-22 में 10,000 करोड़ रुपये,
FY 2023-24 में 31,150 करोड़ रुपये,
FY 2024-25 में 52,860 करोड़ रुपये,

और FY 2025-26 में 36,913 करोड़ रुपये ऑयल बॉन्ड भुगतान में खर्च किए गए. इसके ऊपर ब्याज अलग है. सरकारी तर्क यह है कि 2014 का सस्ता पेट्रोल वास्तव में उधारी पर आधारित था, जिसकी कीमत बाद की पीढ़ियां चुका रही हैं। 

चार साल का पूरा हिसाब
2022 से 2026 के बीच भारत में पेट्रोल चार बार सस्ता हुआ और एक बार बढ़ा. केंद्र सरकार ने इस पूरे दौर में एक्साइज कटौती के जरिए करीब 30,000 करोड़ रुपये का राजस्व छोड़ा तेल कंपनियों ने रूस-यूक्रेन दौर में 24,500 करोड़ और LPG संरक्षण में 40,000 करोड़ का घाटा उठाया. कोई बॉन्ड नहीं, कोई उधारी नहीं, कोई अगली पीढ़ी पर बोझ नहीं। 

 

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