TMC और LJP के विवाद में नाम-चिह्न का फैसला कैसे होता है? जानें शिंदे-शिवसेना मामले का नियम

नई दिल्ली

ममता बनर्जी ने मई में पश्चिम बंगाल गंवाया और सितंबर में तृणमूल कांग्रेस नाम और दो फूल जोड़ा चुनाव चिह्न भी छोड़ना पड़ा। हालांकि, इनका इस्तेमाल अरूप रॉय गुट भी नहीं कर सकेगा। अंतरिम आदेश के जरिए मुख्य नाम और चिह्न को फ्रीज कर दिया गया है। आगे जाकर स्थिति बदल भी सकती है। सवाल है कि जब साल 2022 में शिवसेना टूटने के मामले में महाराष्ट्र के मौजूदा उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाले गुट को चुनाव आयोग ने नाम और निशान कैसे दे दिया था।

पहले समझते हैं कि अगर एक ही पार्टी में दो गुट बन जाते हैं और दोनों ही मुख्य दल होने का दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग फैसला किस तरह से लेता है। चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968, यह वही आदेश है जिसका इस्तेमाल करके चुनाव आयोग एक पूरी प्रक्रिया से गुजरता और पता लगाता है कि किसे पार्टी का चुनाव चिह्न, झंडा और नाम मिलेगा। इसमें भी धारा 15 बेहद अहम है।
कानून समझ लेते हैं

इस कानून की धारा 15 के अनुसार, 'जब आयोग को अपने पास मौजूद जानकारी से यह पता चलता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के विरोधी गुट या समूह हैं और हर कोई खुद को ही वह असली दल बताता है। ऐसे में आयोग मामले से जुड़े सभी उपलब्ध तथ्यों और हालात पर विचार करने और उन गुटों या समूहों के नेताओं और अन्य लोगों की बात सुनने के बाद यह तय कर सकता है कि उन विरोधी गुटों या समूहों में से कोई एक ही वह मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है या उनमें से कोई भी नहीं है। आयोग का यह फैसला उन सभी विरोधी गुटों या समूहों पर लागू होगा।'

आसान भाषा में एक जानकार बताते हैं कि चुनाव आयोग इस बात पर फोकस करेगा कि दोनों गुटों में संगठन स्तर पर कितने सदस्य हैं। साथ ही विधायकों और सांसदों की गिनती भी अहम भूमिका निभाएगी। दोनों पक्ष इसकी जानकारी एक हलफनामे के जरिए देंगे। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी बताते हैं कि आयोग 'रूल ऑफ मेजॉरिटी' के आधार पर फैसला करता है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जांच करेगा कि किस गुट के पास सांसद, विधायक और संगठन पर ज्यादा समर्थन है।

पार्टी किसके साथ, यह पता करने का भी एक तरीका है

पूर्व चुनाव आयुक्त बताते हैं कि संगठन में ज्यादा समर्थन किसके साथ है, यह पता करने के लिए सभी पार्टी पदाधिकारी और उन लोगों को गिना जाता है, जो पार्टी के अध्यक्ष चुनने का अधिकार रखते हैं। पार्टी को इस संबंध में अपना हलफनामा दाखिल करना होता है। इसके बाद आयोग हस्ताक्षरों को मिलाता है। पूरी प्रक्रिया के बाद तय किया जाता है कि किस पार्टी को चिह्न मिलेगा।

एकनाथ शिंदे को क्यों मिल गया चुनाव चिह्न

हालांकि, शिवसेना में टूट मामले में भी चुनाव आयोग ने पहली ही बार में शिंदे गुट को मुख्य दल नहीं माना था। पहले शिवसेना नाम और तीर कमान चिह्न को फ्रीज कर दिया गया और दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चिह्न चुनने के लिए कहा गया था। 2023 में इसका अधिकार शिंदे समूह को मिला।

आयोग ने कहा था कि उनका बहुमत के परीक्षण पर आधारित है, क्योंकि शिंदे गुट का समर्थन कर रहे विधायकों को 2019 विधानसभा चुनाव में करीब 76 फीसदी वोट मिले। जबकि, उद्धव ठाकरे गुट के मामले में यह आंकड़ा 23.5 प्रतिशत पर था। उस चुनाव में अविभाजित शिवसेना के कुल 55 उम्मीदवार जीते थे। 78 पेज लंबे आदेश में आयोग ने कहा था, 'शिव सेना पार्टी का नाम और पार्टी का चुनाव चिह्न तीर कमान याचिकाकर्ता गुट के पास ही रहेगा।' याचिकाकर्ता शिंदे गुट था। चुनाव आयोग के सामने शिंदे गुट ने साबित किया था कि उसके पास 40 विधायकों और 18 में से 13 सांसदों का समर्थन है। साथ ही गुटों ने संगठन स्तर पर भी हस्ताक्षरों से जुड़ा एक हलफनामा आयोग में दाखिल किया था।

TMC के मामले में क्या बोला चुनाव आयोग

खास बात है कि टीएमसी के मामले में अभी अंतरिम आदेश ही जारी हुआ है। संभावनाएं हैं कि आगे चलकर किसी गुट को मुख्य नाम और चिह्न मिल भी सकता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। अंतरिम आदेश में कहा गया है, 'रिकॉर्ड पर मौजूद सभी जानकारियों पर ठीक से विचार करने के बाद… आयोग का मानना ​​है कि तृणमूल कांग्रेस में दो विरोधी गुट हैं, जिनमें से एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे की कमान अरूप रॉय संभाल रहे हैं।'

अंतरिम आदेश के अनुसार, 'अब हर गुट खुद के असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा कर रहा है, इसलिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राम 15 के तहत आयोग को इस मामले पर ठोस फैसला लेना होगा।' आयोग ने साफ कर दिया है कि मौजूदा उपचुनाव की स्थिति को देखते हुए ऐसा किया गया है और मौजूदा अंतरिम आदेश मामला खत्म होने तक जारी रहेगा।

खास बात है कि 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने हैं। दोनों ही गुटों ने सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है।

चिराग पासवान मामले में किसी को नहीं मिले

यह टूट साल 2021 की है। तब रामविलास पासवान के निधन के कुछ समय बाद झोपड़ी के चिह्न वाले लोक जनशक्ति पार्टी में खटपट की खबरें तेज हो गईं थीं। दरअसल, यहां पसवान के बेटे और मौजूदा सांसद चिराग और भाई पशुपति कुमार पारस में दल को लेकर विवाद था। दोनों ही असली दल की अगुवाई का दावा कर रहे थे।

2 अक्टूबर 2021 को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी किया था, जिसके बाद नाम और चिह्न को फ्रीज कर दिया गया था और किसी को भी इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं थी। दो दिन बाद यानी 5 अक्टूबर को नए नाम और चिह्न आवंटित किए गए। खास बात है कि इसके 28 दिन बाद ही 30 अक्टूबर 2021 में बिहार में दो सीटों पर उपचुनाव होने थे। ठीक वैसा ही जैसा बंगाल में दो सीटों पर उपचुनाव होने हैं।

चुनाव आयोग ने चिराग और पशुपति गुट को अपने नाम में लोक जनशक्ति पार्टी नाम का जुड़ाव रखने की अनुमति दे दी थी और नए चिह्न बांटे थे। चिराग के खाते में हेलीकॉप्टर आया और नाम लोक जनशक्ति दल (राम विलास) और चाचा पारस को सिलाई मशीन चिह्न के साथ नाम राष्ट्रीय लोक जनशक्ति दल मिला था। फिलहाल, दोनों ही गुट अपने नए नाम और पहचान को बरकरार रखे हुए हैं। साल 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में चिराग ने हेलीकॉप्टर चिह्न और नए नाम के साथ हाजीपुर सीट से जीत हासिल की थी और NDA में शामिल होकर मंत्री बने।

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