कैलाश पर्वत पर आज तक क्यों नहीं चढ़ पाया इंसान, जानें रहस्य और वजह

आपके घर में सुबह होने वाली पूजा में एक नाम जरूर लिया जाता है ऊं नमः शिवाय. जब भी आप भोलेनाथ का ध्यान करते हैं, आंखें बंद करते ही एक तस्वीर सामने आती है. जिसमें बर्फ से ढका एक विशाल पर्वत, जिसके शिखर पर स्वयं भगवान शिव विराजमान हैं. ये कोई कल्पना नहीं है. ऐसा पर्वत वास्तव में मौजूद है, तिब्बत में स्थित कैलाश पर्वत, जो भारत से कुछ ही दूरी पर है.

लेकिन अब जो बात आप जानने वाले हैं, वह आपको चौंका सकती है. इंसान ने चांद पर कदम रख लिया, समुद्र के भीतर सुरंगें बना लीं, और दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत एवरेस्ट को भी फतह कर लिया. आज वहां चढ़ने के लिए कतारें लगती हैं, पैसे देकर लोग शिखर तक पहुंच जाते हैं. लेकिन भगवान शिव के इस धाम यानी कैलाश पर्वत. पर आज तक कोई इंसान नहीं चढ़ पाया. हैरानी की बात यह है कि कैलाश पर्वत माउंट एवरेस्ट से लगभग 2000 मीटर छोटा है. ऐसा नहीं है कि कोशिश नहीं हुई. करीब 100 साल पहले दो अंग्रेज पर्वतारोहियों ने यहां चढ़ने का रास्ता भी खोज लिया था, लेकिन आखिरी वक्त पर कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें वापस लौटना पड़ा. इसे इत्तेफाक कहें या कोई संकेत?

दुनिया के सबसे बड़े पर्वतारोहियों में से एक, राइनहोल्ड मेसनर, जिन्हें चीन सरकार ने खुद कैलाश पर चढ़ने की अनुमति दी थी, उन्होंने भी मना कर दिया. जाते-जाते उन्होंने जो कहा, वही इस कहानी का सबसे अहम हिस्सा है, 'अगर हमने इस पर्वत को जीत लिया, तो हम किसी ऐसी चीज को जीत लेंगे, जिसमें लोगों की आस्था बसती है.'

कैलाश क्यों है इतना खास?
अब जरा सोचिए रास्ता भी है, अनुमति भी मिल सकती है, फिर भी कोई ताकत है जो लोगों को रोकती है. कुछ लोग दावा करते हैं कि कैलाश के आसपास समय का असर अलग होता है, नाखून और बाल तेजी से बढ़ते हैं. कुछ कथाएं तो यहां तक कहती हैं कि पर्वत के पास जाने वाले लोग जल्दी बूढ़े हो जाते हैं. लेकिन इन बातों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है
असल में, ये कहानियां ज्यादातर अफवाहों और बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातों पर आधारित हैं. ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, मौसम की कठिन परिस्थितियां और मानसिक दबाव, ये सब मिलकर इंसान को भ्रमित कर सकते हैं.

कैलाश केवल हिंदुओं के लिए ही पवित्र नहीं है. बौद्ध धर्म में इसे ध्यान का केंद्र माना जाता है, जैन धर्म के अनुसार यहीं पहले तीर्थंकर ऋषभदेव को मोक्ष मिला था, और तिब्बत के बोन धर्म में इसे धरती की आत्मा कहा जाता है. यानी चार बड़े धर्म इस एक पर्वत को श्रद्धा से देखते हैं. इस पर्वत के आसपास से चार प्रमुख नदियां निकलती हैं – सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र और कर्णाली. इन नदियों का पानी करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है.

कैलाश की तलहटी में दो झीलें भी हैं मानसरोवर और राक्षस ताल. एक का पानी मीठा और जीवनदायी है, जबकि दूसरी का पानी खारा और बंजर. एक ही जगह पर प्रकृति के दो बिल्कुल अलग रूप दिखाई देते हैं.

चढ़ाई क्यों नहीं हो पाती है?
इतिहास में कुछ पर्वतारोहियों ने यहां चढ़ने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें असफलता ही मिली. समय के साथ यह विश्वास और मजबूत हो गया कि यह पर्वत जीतने के लिए नहीं, बल्कि पूजने के लिए है. आज भी कैलाश पर्वत पर चढ़ाई पूरी तरह प्रतिबंधित है. यह उन कुछ स्थानों में से एक है, जहां इंसान ने अपनी सीमाओं को स्वीकार किया है. एवरेस्ट पर आज कचरा, टूटे उपकरण और लावारिस शव तक मिल जाते हैं. लेकिन कैलाश अब भी वैसा ही है- शांत, पवित्र और अछूता. शायद कुछ चीजें जीतने के लिए नहीं होतीं, बल्कि उनके आगे सिर झुकाने के लिए होती हैं. कैलाश पर्वत भी उन्हीं में से एक है.

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