धर्म, समानता और अधिकारों की टकराहट: सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक सुनवाई

नई दिल्ली

 सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों वाली संविधान पीठ ने ऐसी सुनवाई शुरू की है, जिसका असर सिर्फ केरल के सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा। यह मामला अब व्यापक संवैधानिक बहस में बदल चुका है, जिसमें अलग-अलग धर्मों में महिलाओं के प्रवेश, धार्मिक प्रथाओ की वैधता, संप्रदायों की स्वायत्तता, समानता के अधिकार, गरिमा, धार्मिक स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा की सीमा जैसे बड़े सवाल शामिल है। अदालत केवल एक मंदिर या एक परंपरा का परीक्षण नहीं कर रही, बल्कि यह तय करने जा रही है कि महिलाओं के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।

कोर्ट तक कैसे पहुंचा ?
सितंबर 2018 में पांच जजों की सविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला दिया था कि केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक असंवैधानिक है। यह अधिकारों का उल्लंघन करती है। इसके खिलाफ रिव्यू पिटिशन दाखिल हुई। जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह विवाद अकेला नहीं है। मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद प्रवेश, पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर प्रवेश और अन्य धार्मिक प्रथाओं से जुड़े समान संवैधानिक प्रश्न भी लंबित हैं।

9 जजों की बेंच के सामने कौन-कौन से हैं मामले ?
    सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामलाः यह मूल विवाद है। सवाल यह है कि मंदिर में आयु या जैविक अवस्था के आधार पर महिलाओं के प्रदेश पर रोक लगाई जा सकती है।
    मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद और दरगाह में प्रवेश का मामलाः याचिकाओं में कहा गया है कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश से रोकना समानता, गरिमा, जीवन और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
    गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर में प्रवेश का मामलाः लंबे समय से यह विवाद रहा है कि यदि कोई पारसी महिला गैर-पारसी पुरुष से विवाह कर ले, ते क्या उसे फायर टेपल में प्रवेश का अधिकार रहेगा?
    दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं, बच्चियों से जुड़ी प्रथाः बच्चियों के खतना यानी महिला जननाग विकृति (FGM) की प्रथा को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह मानवाधिकार, गरिमा का उल्लघन है।

कोर्ट के सामने कौन-कौन से हैं बड़े कानूनी सवाल ?
    अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा क्या है। हर व्यक्ति को धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है।
    व्यक्ति के अधिकार और धार्मिक संप्रदाय के अधिकार में संतुलन कैसे होः अनु. 26 धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक मामलों का प्रबंधन का अधिकार देता है।
    क्या अनुच्छेद 26 के अधिकार संविधान के भाग-3 के अन्य प्रावधानों के अधीन है: धार्मिक संप्रदायों को मिले अधिकार क्या केवल सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तक सीमित है या उन्हें समानता, गरिमा जैसे अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन भी पढ़ा जाएगा?
    धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या है: क्या अदालत यह जाच सकती है की कोई प्रथा धर्म का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं। क्या अदालत यह देख सकती है कि कोई धार्मिक प्रथा भेदभावपूर्ण है। यही वह बिंदु है जहा 'essential religious practices' सिद्धात की सीमा पर बहस हो रही है।
    अनुच्छेद 25 (2)(b) में हिंदुओं के वर्ग का अर्थ क्या है। यह हिंदू धार्मिक संस्थानों में प्रवेश और सुधार से जुड़ा है। अदालत को तय करना है कि sections of Hindus की संवैधानिक व्याख्या क्या होगी?
    क्या बाहरी व्यक्ति PIL के जरिए किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है: कोई व्यक्ति उस धर्म या सप्रदाय से सबंधित नहीं है, तो क्या वह जनहित याचिका के माध्यम से प्रथा को चुनौती दे सकता है? यह प्रश्न भविष्य की कई याचिकाओं की स्वीकार्यता तय करेगा।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना की अहम टिप्पणी
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि किसी महिला को महीने के तीन दिन अछूत नहीं माना जा सकता और चौथे दिन यह स्थिति खत्म नहीं हो सकती। यह टिप्पणी उस बहस के दौरान आई, जब 2018 के सबरीमाला फैसले में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता से जोड़ने पर सवाल उठे।

केंद्र सरकार का स्टैंड क्या है?
सरकार ने कहा है कि ऐसे मामलों में अदालत को बहुत सीमित दखल देना चाहिए। यह मामला धार्मिक आस्था, परंपरा और संप्रदायिक स्वायत्तता से जुड़ा है। हर धार्मिक प्रथा को आधुनिकता, वैज्ञानिकता या न्यायिक संवेदनशीलता के पैमाने पर नहीं परखा जा सकता। आखिर में यही कहा जा सकता है कि मामले को व्यापक आयाम दे दिया गया है। जजों की संवैधानिक बेंच का फैसला आगे का हल देगा।

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