‘महाकाली’ के टीजर में दिखा रक्तबीज, जानें कौन था ये अजेय असुर और कैसे हुआ अंत

 24 अगस्त यानी कल प्रशांत वर्मा की फिल्म महाकाली का टीजर रिलीज हो चुका है. यह फिल्म 8 जनवरी 2027 को थिएटर में लगेगी. महाकाली के टीजर ने रिलीज होते ही सुर्खियां बटोरना शुरू कर दिया है. वहीं, इस फिल्म में एक्टर अक्षय खन्ना गुरु शुक्राचार्य का रोल निभाते नजर आ रहे हैं. कि किस तरह गुरु शुक्राचार्य असुरों के हक के लिए देवताओं से युद्ध करेंगे. साथ ही, टीजर में देवताओं और असुरों के बीच चल रहे संघर्ष को भी दिखाया गया है.

टीजर में अक्षय खन्ना (गुरु शुक्राचार्य) कहते नजर आ रहे हैं कि, 'समुद्र मंथन के समय देवों और असुरों के समान श्रमदान करने के पश्चात विष्णु ने केवल देवों को अमृत प्रदान किया. ये धर्म है या अधर्म? इंद्र के सिंहासन का अधिकार हमसे छीन लिया गया. ये धर्म है या अधर्म? समस्त असुर जाति को पाताल में धकेलकर 14 लोक के द्वार बंद कर दिए गए. ये धर्म है या अधर्म? केवल 14 दिनों में असुरों का विजय घोष हमारे कानों में गूंज उठेगा. सदैव के लिए असुरगण मुक्त हो जाएंगे.' उसके ठीक बाद गुरु शुक्राचार्य कहते हैं कि, 'रक्तबीज मानव जाति का सर्वनाश कर दो.' तो अब सवाल उठता है कि कौन था असुर रक्तबीज?

कौन था रक्तबीज?
हम हमेशा से पौराणिक कथाओं में असुरों और देवताओं के बीच होने वाले संघर्ष के बारे में सुनते आ रहे हैं. इन्हीं असुरों में सबसे खतरनाक और शक्तिशाली असुर था रक्तबीज. संस्कृत में उसके नाम का अर्थ है रक्त से पैदा होने वाला. उसे यह नाम उसकी खास शक्ति के कारण मिला था. कहा जाता है कि उसके खून की हर बूंद जमीन पर गिरते ही उसके जैसा एक और असुर पैदा हो जाता था. इसी वजह से उसे हराना बेहद मुश्किल था.

चामुण्डा चण्डघाती च मुण्डघातविशारदा।
रक्तबीजासुराणां च रक्तपानकृदुद्यता॥

मार्कण्डेय पुराण के ग्रंथ दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय में रक्तबीज का जिक्र मिलता है. कथा के अनुसार, रक्तबीज कोई साधारण असुर नहीं था. वह बहुत शक्तिशाली और चालाक था. उसका उद्देश्य देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अपना अधिकार जमाना था. उसके पास एक ऐसी अनोखी शक्ति थी, जिसने उसे लगभग अजेय बना दिया था.

मां काली
धीरे-धीरे उसकी शक्ति और उसकी सेना बढ़ती गई. देवताओं को समझ नहीं आ रहा था कि उसे किस तरह रोका जाए. उसके खिलाफ इस्तेमाल किया गया हर हथियार स्थिति को और ज्यादा मुश्किल बना रहा था. कुछ ही समय में देवताओं को लगने लगा कि अगर रक्तबीज को नहीं रोका गया, तो स्वर्ग पर भी उसका कब्जा हो सकता है. जब कोई भी उपाय काम नहीं आया था, तब देवताओं ने मां दुर्गा का आह्वान किया. मां दुर्गा को शक्ति, रक्षा और अधर्म के विनाश का स्वरूप माना जाता है. देवताओं को विश्वास था कि मां दुर्गा ही इस भयंकर असुर का सामना कर सकती हैं.

मां काली का स्वरूप
दुर्गासप्तशती के मुताबिक, युद्ध में उतरने के बाद मां दुर्गा का सामना चण्ड-मुण्ड से हुआ था. जब मां दुर्गा का चण्ड-मुण्ड के साथ युद्ध हो रहा था, तब मां ने चण्ड और मुण्ड का वध कर दिया था. उसके बाद मां दुर्गा अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों के साथ रक्तबीज से युद्ध करने पहुंचीं. उन्होंने रक्तबीज पर वार किया, लेकिन जैसे ही उसके शरीर से खून जमीन पर गिरा, उसी खून से कई नए रक्तबीज पैदा हो जाते. हर वार के बाद उसकी संख्या बढ़ती जा रही थी. देखते ही देखते रक्तबीज की एक विशाल सेना तैयार हो गई. यह देखकर मां दुर्गा बहुत क्रोधित हो गईं और उन्होंने अपना उग्र रूप धारण कर लिया. उस उग्र स्वरूप का नाम था मां काली.

कैसे हुआ था रक्तबीज का अंत?
दुर्गासप्तशती के अनुसार, मां काली ने रक्तबीज और उसके साथ पैदा हुए सभी असुरों का संहार करना शुरू कर दिया. वह हर असुर को मारने के बाद उसका खून पी लेती थीं, ताकि उसकी एक भी बूंद जमीन पर न गिरे और नया असुर पैदा न हो. धीरे-धीरे उन्होंने पूरी रक्तबीज सेना का अंत कर दिया. अब केवल असली रक्तबीज बचा था. मां काली ने उसका भी वध कर दिया और उसके शरीर से निकलने वाला पूरा रक्त पी लिया. इस तरह रक्तबीज का पूरी तरह अंत हो गया.

लेकिन इसके बाद भी मां काली का क्रोध शांत नहीं हुआ. वह ताडंव करने लगीं. उन्हें यह ध्यान ही नहीं रहा कि रक्तबीज का अंत हो चुका है. उनका यह उग्र रूप इतना भयंकर था कि देवता भी चिंतित हो गए. उन्होंने भगवान शिव से मदद की प्रार्थना की, क्योंकि उन्हें लगा कि केवल शिव ही मां काली को शांत कर सकते हैं.

भगवान शिव उस स्थान पर पहुंचे जहां मां काली तांडव कर रही थीं. उन्होंने उनके रास्ते में मृत शरीरों के बीच जाकर लेटने का निर्णय लिया. तांडव करते हुए मां काली का पैर गलती से भगवान शिव के ऊपर पड़ गया. जैसे ही मां काली को पता चला कि उनका पैर भगवान शिव पर पड़ा है, उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ. उनका क्रोध तुरंत शांत होने लगा और शर्म के कारण उनकी जीभ बाहर निकल आई. उन्हें महसूस हुआ कि क्रोध में उन्होंने अपने ही पति को नहीं पहचान.

इसके बाद मां काली शांत हुईं और अपने पहले वाले स्वरूप में लौट आईं. मां काली के चरणों में भगवान शिव का दिखाई देना शक्ति और शिव के संबंध को भी दर्शाता है. इसका एक अर्थ यह माना जाता है कि शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं. शक्ति के बिना शिव निष्क्रिय हैं, जबकि शिव शक्ति को दिशा और संतुलन प्रदान करते हैं.

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