वैभव सूर्यवंशी बने टीम इंडिया के नए स्टार, 6 साल की कड़ी ट्रेनिंग से रचा सफलता का इतिहास

नई दिल्ली
आईपीएल के पिछले दो सीजन में अपनी आतिशी और खौफनाक बल्लेबाजी से पूरी दुनिया को हैरान करने वाले 15 साल के वैभव सूर्यवंशी आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। आईपीएल 2026 में राजस्थान रॉयल्स के लिए 237 से ज्यादा के स्ट्राइक रेट से 776 रन कूटकर ऑरेंज कैप जीतने वाले वैभव को उनके इसी प्रदर्शन के दम पर भारतीय सीनियर टीम के इंग्लैंड और आयरलैंड दौरे के लिए टी20 टीम में शामिल किया गया है। हर कोई वैभव के इस गगनचुंबी बैट स्विंग और पावर-हिटिंग का कायल है, लेकिन वर्ल्ड क्रिकेट के इस सबसे रोमांचक बल्लेबाज को गढ़ने के पीछे 6 साल की मेहनत छिपी है।

रोज़ाना 100 ओवर खेलते थे वैभव, थक जाते थे गेंदबाज
वैभव के बचपन के कोच मनीष ओझा ने PTI को दिए एक इंटरव्यू में वैभव के बचपन, उसकी ट्रेनिंग और उसके माता-पिता के संघर्ष को लेकर कई चौंकाने वाले और दिलचस्प खुलासे किए हैं। जब वैभव ने टेनिस क्रिकेट से लेदर बॉल क्रिकेट की तरफ रुख किया, तब वह महज 10 साल के थे। कोच मनीष ओझा ने बताया कि पटना में उनकी एकेडमी में वैभव की ट्रेनिंग सुबह 7:30 बजे शुरू होती थी और दोपहर 4:00 बजे तक लगातार चलती थी। इस दौरान वह बिना थके रोजाना कम से कम 600 गेंदों का सामना करते थे।

कोच ने इस कड़े रूटीन का पूरा ब्रेक-अप बताते हुए कहा, 'शुरुआत की 200 से 300 गेंदें मैं खुद अकेले उसे थ्रोडाउन देता था। जब मैं थक जाता था, तो हमारा सपोर्ट स्टाफ यह जिम्मा संभालता था। उनके थकने के बाद एकेडमी के नियमित गेंदबाज वैभव को गेंदबाजी करते थे। जब गेंदबाज भी पूरी तरह थक जाते थे, तो हम बच्चों के 2-3 ग्रुप बनाकर उन्हें टास्क देते थे। इसके अलावा वैभव बॉलिंग मशीन का भी सामना करता था। इसी लगातार रिपिटिटिव ट्रेनिंग ने वैभव के भीतर वो मसल मेमोरी पैदा की है, जिससे आज गेंद सीधे बाउंड्री पार जाती है।"

समस्तीपुर से पटना का सफर और मां का वो बड़ा त्याग
वैभव सूर्यवंशी का घर समस्तीपुर में था, जहां से पटना स्थित एकेडमी की दूरी एक तरफ से ढाई घंटे की थी। वैभव के पिता संजीव जी और मां आरती जी ने अपने बेटे को चैंपियन बनाने के लिए जो त्याग किए, उसकी कहानी बेहद भावुक करने वाली है। कोच मनीष ओझा ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया, 'वैभव की मां आरती जी रोज तड़के 2:00 या 2:30 बजे उठ जाती थीं। वह सिर्फ वैभव, उसके पिता या ड्राइवर के लिए ही नहीं, बल्कि समस्तीपुर से साथ आने वाले गेंदबाजों और हमारी एकेडमी के नेट बॉलर्स के लिए भी खाना बनाती थीं। वह रोज 10-15 लोगों का लंच तैयार करती थीं। जो बच्चे घर से खाना नहीं ला पाते थे या जो गेंदबाज थक जाते थे, वे सब वैभव का खाना शेयर करते थे। रोज सुबह उठकर इतने लोगों का खाना बनाना एक मां का वो योगदान है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।' सुबह 5:00 बजे ही वैभव और उनके पिता समस्तीपुर से गाड़ी चलाकर पटना के लिए निकल जाते थे ताकि सुबह साढ़े सात बजे तक हर हाल में नेट्स पर पहुंच सकें।

पूरे देश के माता-पिता के लिए रोल मॉडल बने वैभव
वैभव सूर्यवंशी की इस राइज ने देश के खेल जगत में एक नई क्रांति ला दी है। कोच ओझा ने बताया कि वैभव का ग्राफ देखने के बाद अब पेरेंट्स में अपने बच्चों को क्रिकेटर बनाने का एक नया जुनून सवार हो गया है। कोच ने हंसते हुए कहा, 'आप 9-10 साल के बच्चों की बात कर रहे हैं, आज की तारीख में माता-पिता अपने 5-5 साल के बच्चों को उंगली पकड़कर हमारी एकेडमी ला रहे हैं ताकि वे अपने बच्चों को अगला वैभव बना सकें। वैभव आज पूरे भारत के बच्चों के लिए एक प्रेरणा और माता-पिता के लिए रोल मॉडल बन चुका है।'

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