भारत की 10 उपग्रहों की दहाड़ से हिली दुनिया, वाशिंगटन से बीजिंग तक खलबली

बेंगलुरु 

करीब दो दशक पहले भारतीय वैज्ञानिकों ने एक सपना देखा था. यह सपना बस स्‍टॉप से निकली उस एक बस की तरह था, जो निश्चित स्‍टॉप पर अपनी सवारियों को छोड़ती हुई आगे बढ़ रही थी. इसरो के वैज्ञानिक भी कुछ ऐसा ही करना चाहते थे, लेकिन उसके सपने में बस की जगह एक रॉकेट ने ले रखी थी. तब तक पाकिस्‍तान जैसों की औकात ही क्‍या, अमेरिका जैसे विकसित देश के लिए भी यह कर दिखाना किसी बड़े ख्‍वाब से कम नहीं था. आखिरकार वह तारीख आ ही गई, जब भारत ने कुछ ऐसा किया, जिसने वाशिंगटन से लेकर बीजिंग तक तमाम विकसित देशों के होश उड़ा दिए। 

जी हां, 28 अप्रैल 2008 की उस शाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के PSLV-C9 ने अंतरिक्ष की तरफ शुरू दौड़ के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे. आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से टेकऑफ हुए PSLV-C9 रॉकेट से एक साथ दस उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा गया था. इस रॉकेट को अंतरिक्ष की दस अलग अलग लोकेशन पर इन उपग्रहों को ड्रॉप करना था. एक छोटी सी चूक और लोकेशन में रत्‍ती भर का अंतर पूरे मिशन पर पानी फेर सकती थी. पूरी दुनिया की निगाहें भारत के पहले ‘मल्टी-पेलोड लॉन्च’ पर टिकी हुई थीं. आखिरकार, इसरो के वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई और PSLV-C9 ने अपना मिशन सफलता पूर्वक पूरा कर लिया। 

दुनिया के लिए बेहद खास थी यह घटना

    PSLV-C9 की सबसे सफलता यह थी कि उसने एक साथ 10 उपग्रह लॉन्च किए. उस समय के लिए यह एक अवश्विसनीय उपलब्धि थीऋ तब तक स्‍पेस में सेटेलाइट लॉन्च का काम ज्‍यादातर अमेरिका, रूस, यूरोप और चीन जैसे देश ही करते थे. ऐसे में भारत की इस सफलता ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। 

    तकनीकी रूप से भी यह मिशन बहुत खास था. PSLV रॉकेट को चार स्‍टेज में मिशन को पूरा करना था और इसमें अलग-अलग तरह के ईंधन का इस्तेमाल होना है. इस मिशन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इस एक ही मिशन में कई सेटेलाइट्स को अलग-अलग समय और अलग-अलग ऊंचाई पर छोड़ना था। 

    PSLV-C9 ने यह साबित कर दिया कि भारत कम खर्च में भी बेहतरीन और भरोसेमंद स्‍पेश मिशन को पूरा कर सकता है. इस मिशन के बाद दुनिया के कई देशों ने भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देखना शुरू किया. जिन देशों के पास अपने रॉकेट नहीं थे, उन्हें भारत एक सस्ता और भरोसेमंद विकल्प नजर आया। 

भारत के लिए यह उपलब्धि क्यों बड़ी थी?
    भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में बहुत छोटे स्तर से शुरुआत की थी. धीरे-धीरे वैज्ञानिकों की मेहनत से देश ने अपने रॉकेट और सेटेलाइट बनाना सीखा. PSLV-C9 की सफलता उसी मेहनत का नतीजा थी. यह सिर्फ एक तकनीकी सफलता नहीं थी, बल्कि यह साबित करता था कि भारत अब अपने दम पर बड़े काम कर सकता है। 

    इस मिशन के बाद इसरो ने छोटे उपग्रहों के लॉन्च पर और ध्यान दिया. आगे चलकर इसी अनुभव की वजह से 2017 में भारत ने एक साथ 104 उपग्रह लॉन्च करने का रिकॉर्ड भी बनाया. यानी PSLV-C9 ने ही भविष्‍य की बड़ी सफलताओं की राह तैयार की थी। 

    PSLV-C9 की सफलता इसलिए भी खास थी, क्योंकि यह सीमित संसाधनों में हासिल की गई थी. इसरो का बजट दुनिया की बड़ी स्‍पेस एजेंसियों से काफी कम थी. इसका शानदार प्रदर्शन PSLV-C9 के जरिए पूरी दुनिया देख चुकी थी. वहीं, इस सफलता ने भारत को आत्मनिर्भरता की तरफ देखने की नई दिशा भी दी थी। 

    PSLV-C9 की सफलता का फायदा भारत को आर्थिक तौर पर भी हुआ. इसरो ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बनाई और दूसरे देशों के उपग्रह लॉन्च करने का काम भी मिलने लगा. इससे भारत को कमाई के नए मौके मिले और देश की छवि और ताकत बेहद मजबूत हुई। 

PSLV-C9 ने एक साथ इतने सारे सेटेलाइट्स को कैसे लॉन्च किया?
पीएसएलवी-सी9 ने एक साथ 10 उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया. इस मिशन की असली सफलता मल्टीपल पेलोड्स को एक साथ ले जाने की टेक्‍नोलॉजी थी. रॉकेट में मेन सेटेलाइट कार्टोसैट-2ए को सबसे पहले अलग किया था. फिर लगभग 45 सेकंड बाद पर अन्य सभी छोटे सेटेलाइट्स को एक-एक उनकी सही जगह पर स्‍थापित किया गया। 

स्‍पेस में स्‍थापित किए गए 10 उपग्रह कौन से थे और इनका वजन कितना था?
सभी 10 सेटेलाइट्स का कुल वजन करीब 824 किलो था, इसमें सबसे भारी 690 किलो का कार्टोसैट-2ए सैटेलाइट था. इसके अलावा, इस मिशन में 83 किलो का आईएमएस-1 और 50 किग्रा किलो के आठ नैनो सेटेलाइट्स शामिल थे. कार्टोसैट-2ए एक भारतीय सेटेलाइट था, जो हाई-रिजॉल्‍यूशन तस्वीरें लेने की क्षमता रखता था. इसके अलावा, आईएमएस-1 भी एक भारतीय मिनी सेटेलाइट था, जिसे नई टेक्‍नोलॉजी का परीक्षण करने के लिए बनाया गया था. आठ नैनो सेटेलाइट कनाडा, जर्मनी, जापान, डेनमार्क, नीदरलैंड यूनिवर्सिटी ने तैयार किए थे.

क्‍या कार्टोसैट-2ए सेटेलाइट को लेकर क्‍या विवाद हुआ था?
कार्टोसैट-2ए सेटेलाइट को लेकर सवाल खड़ा हुआ कि यह एक डिफेंस सेटेलाइट था. इस सवाल ने लॉन्च के समय काफी बड़ी बहस छेड़ दी थी. आधिकारिक तौर पर, कार्टोसैट-2ए को शहरी और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए एक रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट बताया गया था. लेकिन, इसकी हाई रिजॉल्‍यूशन क्षमता को देखते हुए यह कहा गया कि भारत ने पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों की निगरानी के लिए मिलिट्री सेटेलाइट स्‍पेस में भेजा है.

क्या यह सचमुच कोई विश्व रिकॉर्ड था?
हां, उस समय यह एक बड़ी उपलब्धि थी. पीएसएलवी-सी9 की सफलता के साथ, भारत एक ही मिशन में सबसे अधिक सेटेलाइट लॉन्च करने वाला देश बन गया था . हालांकि रूस ने 2007 में एक रॉकेट से 16 उपग्रह लॉन्च किए थे, लेकिन उनका कुल वजन केवल 300 किलोग्राम के आसपास था, जबकि भारत ने 824 किलोग्राम वजन ले जाकर सबसे भारी पेलोड ले जाने का रिकॉर्ड बनाया था. बाद में इसरो ने 2017 में पीएसएलवी-सी37 मिशन से 104 सेटेलाइट लॉन्च करके इस रिकॉर्ड को तोड़ दिया था.

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