सेक्स वर्क पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- कानून के दायरे में हो तो अपराध नहीं

 नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन (अवकाश) बेंच ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी वरिष्ठ वकील इस बेंच के सामने मामलों की जल्द सुनवाई (अर्जेंट मेंशनिंग) के लिए पेश नहीं होगा। 

बेंच ने कहा कि वरिष्ठ वकीलों को कोर्ट के सामने मौखिक या लिखित रूप से अर्जेंसी दिखाते हुए मामले को जल्द सूचीबद्ध करने की मांग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

मर्जी से सेक्स वर्क अपराध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना गैरकानूनी नहीं है। वहीं वेश्यालय या कोठे चलाना गैरकानूनी है। बता दें कि इमोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन ऐक्ट 1956 में बनाया गया था। इसके तहत कई धाराएं हैं और कोठे और वेश्यालय चलाने का अपराध बताया गया है। इस ऐक्ट की धारा 3 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति देह व्यापार के लिए अपनी जगह को किराए पर देता है या फिर उपयोग की अनुमति देता है तो उसे 1 से 3 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में अवकाश के दौरान मामलों की सुनवाई कर रही जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली दो अलग-अलग जजों की पीठ ने सोमवार को एक बड़ा निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मामलों पर जल्द सुनवाई या किसी भी प्रकार की अर्जेंट मेंशनिंग के लिए कोई भी वरिष्ठ वकील (सीनियर एडवोकेट) अब सीधे बेंच के सामने पेश नहीं होगा। 

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में आमतौर पर सीनियर वकील अर्जेंट मामलों में बेंच के सामने मेंशनिंग करते हैं और अर्जेंसी यानी अति आवश्यकता का हवाला देकर किसी भी मामले को तय समय से पहले सुनने की गुहार लगाते हैं. इस प्रक्रिया को मेंशनिंग कहा जाता है, जिसे अमूमन वरिष्ठ वकील कोर्ट रूम में मौखिक या लिखित रूप से जजों के सामने उठाते थे, जिसके बाद कोर्ट मामले की गंभीरता को तय कर जल्द सुनवाई या आदेश पारित करने पर विचार करता है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने अब इस पूरी व्यवस्था पर फिलहाल के लिए रोक लगा दी है. कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वरिष्ठ वकीलों को मामलों की जल्द सुनवाई के लिए पीठ के सामने आने की इजाजत नहीं होगी, जिसके बाद अब वह मेंशनिंग नहीं कर पाएंगे 

ITPA में क्या है
इसकी धारा 4 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति सेक्स वर्कर की कमाई का इस्तेमाल करता है तो यह अपराध है। यह धारा सेक्स वर्कर के परिवार के लोगों पर भी लागू होती है। धारा 5 में कहा गया है कि जबरदस्ती, बहलाकर या फिर मजबूर करके किसी को देह व्यापार के लिए मजबूर करना भी अपराध है। धारा 7 में कहा गया है कि सार्वजनिक स्थान या किसी धार्मिक स्थान के 200म ीटर के दायरे में सेक्स वर्क करना अपराध है। हालांकि इस कानून में कहीं भी सहमतिसे सेक्स का जिक्र नहीं किया गया है।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने बुद्धदेव कर्माकर बनाम बंगाल सरकार के मामले में भी बड़ा फैसला सुनाया था। यह मामला सेक्स वर्करों के पुनर्वास और अधिकारों को लेकर था। कोर्ट ने कहा था कि जिस तरह से संविधान के अनुच्छेद 21 में हर व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार मिला है उसी तरह सेक्स वर्कर भी भारत के नागरिक हैं और उन्हें कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की जांच में कई बार सामने आया है कि सेक्स वर्कर्स के साथ पुलिस का रवैया ठीक नहीं होता है। यह उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है। कोर्ट कई बार कह चुका है कि सहमित से सेक्स वर्क करना अपराध नहीं है। ऐसे में अगर कोई आईटीपीए की बाकी धाराओं का उल्लंघन नहीं कर रहा है तो उसे परेशान नहीं करना चाहिए।

इस फैसले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन ने कहा कि अगर कोई अपनी मर्जी से सेक्स वर्क कर रहा है तो उसे हिरासत में रखने, सुधार गृह बेजने की जरूरत नहीं है।

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