Project-75I: जर्मनी से मिलेंगी 6 एडवांस पनडुब्बियां, भारत में ही होगा निर्माण; AIP तकनीक से बढ़ेगी समुद्र में मारक क्षमता

 नई दिल्ली

भारत और जर्मनी के बीच लगभग 9 अरब अमेरिकी डॉलर का सौदा अगले कुछ हफ्तों में साइन होने वाला है. इसमें जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) से छह डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां खरीदा जाएगा. ये पनडुब्बियां मुंबई के मझगांव डॉक में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ बनाई जाएंगी। 

यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा हथियार सौदा होगा, हालांकि फ्रांस से 114 राफेल जेट्स का 34 अरब डॉलर का संभावित सौदा इससे भी बड़ा हो सकता है. प्रोजेक्ट 75आई नाम का यह सौदा 20 साल से अधिक समय से पाइपलाइन में था. टीकेएमएस ने रूस, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और स्पेन की कंपनियों को पीछे छोड़ते हुए कीमत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के मामले में बेहतर ऑफर दिया।  

भारतीय नौसेना की पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े की स्थिति चिंताजनक है. अधिकांश एसएसके पनडुब्बियां 25 साल से अधिक पुरानी हो चुकी हैं. 1999 में शुरू हुई 30 साल की पनडुब्बी निर्माण योजना में 24 पारंपरिक पनडुब्बियों का लक्ष्य था, लेकिन अब तक केवल छह ही मिली हैं। 

भारत ने अरिहंत क्लास की परमाणु पनडुब्बियां खुद बना ली हैं, लेकिन पारंपरिक पनडुब्बियों के डिजाइन में अनुभव की कमी के कारण वह कुछ ही देशों पर निर्भर है. नतीजतन एक 3000 टन की पारंपरिक पनडुब्बी की कीमत स्वदेशी 7000 टन की परमाणु पनडुब्बी जितनी हो जाती है। 

क्षमता और तकनीक के फायदे
टीकेएमएस टाइप-214 डिजाइन का बड़ा वर्जन भारतीय नौसेना को देगा. इसमें हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) सिस्टम होगा, जो पानी के अंदर रहने की क्षमता लगभग दोगुनी कर देगा. ये पनडुब्बियां दुश्मन के जहाजों और व्यापारी जहाजों पर टॉरपीडो व एंटी-शिप मिसाइल से हमला कर सकेंगी. हिंद महासागर में एरिया-डिनायल मिशन चला सकेंगी. लैंड-अटैक क्रूज मिसाइल से तटवर्ती ठिकानों पर सटीक हमले कर सकेंगी। 

नौसेना को 1980 के दशक में खरीदी गई एचडीडब्ल्यू (अब टीकेएमएस) टाइप-209 पनडुब्बियों का अच्छा अनुभव रहा है, जो अभी भी सेवा में हैं. पहले जहाज की डिलीवरी सात साल बाद यानी 2030 के दशक की शुरुआत में होने की उम्मीद है. तीन और पनडुब्बियां खरीदने का विकल्प भी सौदे में है। 

जर्मनी के लिए यह सौदा भारत को रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करने की रणनीति का हिस्सा है. 2024 के फोकस ऑन इंडिया पेपर में बर्लिन ने साफ कहा था कि वह भारत को जर्मन हथियार कंपनियों पर ज्यादा निर्भर बनाना चाहता है. लेकिन हथियार सौदे राजनीतिक फैसले होते हैं।  

जर्मनी ने दो दशक तक भारत को एमपी5 सबमशीन गन नहीं दी, क्योंकि गठबंधन सहयोगी मानवाधिकार उल्लंघन की आशंका जताते थे. वहीं शीत युद्ध के दौरान उसी जर्मनी ने पाकिस्तान को जी3 राइफल और एमपी5 की उत्पादन लाइनें दीं। 

छह पनडुब्बियों का सौदा भारत को जर्मनी से कम से कम चार दशक तक बांध देगा. भविष्य में कोई जर्मन सरकार भारत को रूस के करीब मानकर स्पेयर्स या सपोर्ट रोक सकती है, या तुर्की व पाकिस्तान को भी पनडुब्बी बेच सकती है. सरकार-से-सरकार सौदा थोड़ी सुरक्षा देता है, लेकिन पर्याप्त नहीं। 

इसलिए भारत को टीकेएमएस में मजगांव डॉक जैसी डीपीएसयू के जरिए हिस्सेदारी खरीदनी चाहिए. इससे नई दिल्ली कंपनी के अंदर आवाज पा सकेगी. जर्मन सरकार 5 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी पर फैसला करती है, इसलिए यह बर्लिन के लिए अपनी साझेदारी वाली बात को साबित करने का मौका होगा। 

भारत-इजरायल-जर्मनी सहयोग की संभावना
इस सौदे से भारत और इजरायल दोनों जर्मन डिजाइन की पनडुब्बियां संचालित करेंगे. इजरायल की डॉल्फिन क्लास पनडुब्बियां भी टीकेएमएस से बनी हैं. दोनों देश स्पेयर्स पूलिंग, मेंटेनेंस और एआईपी विकास में सहयोग कर सकते हैं. भारत-इजरायल संबंध रणनीतिक हैं।  

कारगिल युद्ध में इजरायल ने मदद की थी और हाल के वर्षों में भारत ने भी इजरायल को ड्रोन व गोला-बारूद उपलब्ध कराया. संयुक्त अरब अमीरात को भी इस सहयोग में शामिल किया जा सकता है. इस तरह यह सिर्फ हथियार सौदा नहीं, बल्कि साझा रणनीतिक दृष्टि वाला सहयोग बन सकता है। 

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