यूनेस्को में शामिल लवाश ब्रेड, जानिए इसकी खासियत और बनाने का तरीका

रोटी भारतीय थाली का अहम हिस्सा है. वैसे तो अधिकतर लोग गेहूं की रोटी खाते हैं लेकिन इसके अलावा भारत समेत दुनिया भर में रोटियों की हजारों वैरायटी मौजूद हैं. लेकिन क्या आपने कभी ऐसी रोटी के बारे में सुना है जिसे एक बार बनाकर आप 6 महीने तक खा सकते हैं? हम बात कर रहे हैं आर्मेनिया में बनाई जाने वाली रोटी की जिसे लवाश (Lavash) नाम से जाना जाता है. यह कागज जैसी पतली रोटी सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं है, बल्कि यह आर्मेनियाई लोगों की पहचान और उनकी प्राचीन परंपराओं का प्रतीक भी है. यूनेस्को से लेकर दुनिया भर के फूड एक्सपर्ट्स ने इसकी खासियत को सराहा है और इसके बारे में जानकारी दी है.

UNESCO की विरासत में शामिल
Unesco.org की ऑफिशिअल वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, 2014 में लवाश को 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' की सूची में शामिल किया गया था. यह सम्मान इसे इसकी तैयारी के विशेष तरीके और सांस्कृतिक महत्व के कारण मिला है. आर्मेनिया में इसे बनाना एक सामुदायिक उत्सव जैसा होता है जो रिश्तों को और मजबूती प्रदान करता है.
कैसे बनती है यह खास रोटी?

Vidarbergum की रिपोर्ट के अनुसार, लवाश की रेसिपी जितनी सरल है, उसे बनाने की कला उतनी ही कठिन है. इसे बनाने के लिए सिर्फ मैदा, पानी और नमक का इस्तेमाल होता है. इसमें यीस्ट (खमीर) नहीं डाला जाता जो इसे हेल्दी बनाता है. आटे की लोइयों को बेहद पतला बेलकर एक खास गद्दे (कुशन) पर फैलाया जाता है और फिर मिट्टी के पारंपरिक तंदूर जिसे 'तोनिर' (Tonir) कहते हैं, उसकी गर्म दीवारों पर लगाया जाता है. महज 30 सेकंड से 1 मिनट के अंदर यह रोटी बनकर तैयार हो जाती है.

शादी की अनोखी परंपरा और लवाश
आर्मेनियाई संस्कृति में लवाश सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. Phoenixtour.org के मुताबिक, वहां शादियों में नवविवाहित जोड़ों के कंधों पर लवाश की रोटी रखी जाती है. माना जाता है कि ऐसा करने से उनके जीवन में खुशहाली, संपन्नता और बरकत आती है.

6 महीने तक रहती है सुरक्षित
इस ब्रेड की सबसे बड़ी खासियत इसकी शेल्फ लाइफ है. ताजी लवाश नरम होती है और इसे पनीर या कबाब के साथ रोल बनाकर खाया जाता है. लेकिन इसे सुखाकर 6 महीने तक स्टोर किया जा सकता है. जब दोबारा खाना हो तो बस इस पर थोड़ा पानी छिड़कें और यह फिर से ताजी जैसी नरम हो जाती है. पुराने समय में युद्ध के दौरान सैनिक इसे अपने पास रखते थे क्योंकि यह लंबे समय तक खराब नहीं होती थी.

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