भारत को मिला नया ताकतवर सूरज, यूरेनियम के लिए अब नहीं फैलाना पड़ेगा हाथ; सुपरपावर्स की घबराहट बढ़ी

बेंगलुरु 

सौ बात की एक बात ये कि ईरान युद्ध और चुनाव की ख़बरों में ज़्यादातर लोगों का ऐसी ख़बर पर ध्यान नहीं गया जो शायद देश की कई सालों की सबसे बड़ी ख़बर है. कल्पक्कम रिएक्टर में क्या हुआ? बहुत आसान हिंदी में समझाते हैं. भारत का अपना परमाणु बिजली बनाने वाला फ़ास्ट ब्रीडर रीऐक्टर क्रिटिकल हो गया. पब्लिक को ये साइंस का इतना जटिल मामला लगता है कि उससे हुआ क्या है वो पता ही नहीं चलता. तो ज़्यादा कॉम्प्लेक्स चीज़ों में ना भी जाएं तो मोटे तौर पर ख़बर ये हैं कि ये समझ लो कि एक तरह से भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसा रास्ता खोल दिया कि आगे चल कर हम सालों-साल तक अपनी बिजली बना सकते हैं जितनी भी देश को चाहिए. ये ऐसा कमाल है जो दुनिया की बड़ी-बड़ी महाशक्तियां नहीं कर पा रही हैं। 

तो ज़्यादा साइंस में ना जाते हुए इसकी बेसिक चीज़ को समझें तो ये समझिये कि परमाणु रिएक्टर को समझ लीजिए कि एक तरह की परमाणु भट्टी है जिसमें बिजली बनाई जाती है. भट्टी वैसी नहीं जैसी दूसरी भट्टियां होती हैं, सिर्फ़ समझने के लिए उसको हम भट्टी कह रहे हैं. ये तो पब्लिक अब काफ़ी समझ ही गई है कि परमाणु कार्यक्रम पर दुनिया भर में इतना कंट्रोल इसलिए रहता है क्योंकि परमाणु तकनीक से बेतहाशा ऊर्जा बनती है. उससे परमाणु बम भी बना सकते हैं और बिजली भी बना सकते हैं. ईरान यही तो कह रहा है कि वो तो परमाणु कार्यक्रम चलाएगा क्योंकि उसको उससे बिजली बनानी है. अमेरिका और इज़रायल कह रहे हैं कि वो परमाणु कार्यक्रम से बिजली बनाने की आड़ में असल में परमाणु बम बनाना चाहता है. तो वो तो ख़ैर वहां की बात रही । 

हम बात कर रहे हैं अपने परमाणु कार्यक्रम की. तो परमाणु रिएक्टर में क्या होता है कि ईंधन डालते हैं और ईंधन से बिजली बनती है. ईंधन क्या होता है परमाणु रिएक्टर में? ईंधन होता है यूरेनियम नाम का तत्व. यूरेनियम डालते हैं तो अंदर बिजली बनती है और प्लूटोनियम नाम का कचरा निकलता है. दिक़्क़त क्या है कि भारत में यूरेनियम है नहीं. बहुत थोड़ा है. तो यूरेनियम दूसरे देशों से लेना पड़ता है. और वो कोई आसान काम नहीं क्योंकि परमाणु कार्यक्रमों पर कई कंट्रोल वैसे ही लगे हुए हैं. भारत ने अमेरिका के साथ नयूक्लियर डील भी की थी कि उससे कुछ आसानी हो यूरेनियम मिलने में. क्योंकि देश को अगर विकसित बनाना है तो जो सबसे ज़रूरी चीज़ चाहिए वो है बिजली. हम पानी से बिजली बना रहे हैं, कोयले से बनाते हैं, अब सोलर बिजली भी बन रही है, हवा से भी बनती है पवनचक्कियों से । 

सारा खेल यूरेनियम का

लेकिन परमाणु बिजली भी चाहिए. उसमें यूरेनियम का चक्कर है. यूरेनियम हमारे पास है नहीं. लेकिन भारत के एक और रेडियोऐक्टिव तत्व है जिसको परमाणु रिएक्टर में इस्तेमाल कर सकते हैं, वो तत्व है थोरियम. लेकिन थोरियम से चलने वाले रिएक्टर पर दुनिया में ज़्यादा रिसर्च ही नहीं हो पाई. मतलब तकनीक परफ़ेक्ट नहीं हो पाई है थोरियम से बिजली बनाने की. तो अभी की स्थिति ये हैं कि यूरेनियम से बिजली बनती है और कचरे में प्लूटोनियम निकलता है. प्लूटोनियम भी रेडियोऐक्टिव कचरा होता है इसलिए उसको बहुत ही एहतियात से नष्ट करना पड़ता है. लेकिन एक तकनीक ये होती है कि प्लूटोनियम से ही बिजली बना दें तो?

यानी यूरेनियम से जो कचरा निकला फिर उस कचरे से ही बिजली बना दें. यानी कचरे को ही ईंधन बना दें. और फिर जो बिजली बने और फिर उससे जो कचरा निकले उससे फिर बिजली बना दे. फिर जो कचरा निकले उस कचरे से बिजली बना दें. फिर कचरा निकले तो उससे बिजली बना दें. मतलब एक चेन ही बन जाए. जब तक कचरा पूरा इस्तेमाल नहीं हो जाता तब तक ईंधन डालना ही ना पड़े. थ्योरी में तो ये कर सकते हैं. लेकिन कई देश लगे हुए थे कोई उस तरह से कर नहीं पा रहा था. कुछ देश सफल हुए भी लेकिन भारत अपनी तकनीक से लगा हुआ था कि ये कर लें तो फिर तो थोड़े से ही ईंधन से काम चल जाएगा । 

कल्पक्कम भारत का सबसे आधुनिक न्यूक्लियर रिएक्टर है.

कल्पक्कम है तमिलनाडु में चेन्नई के पास. वहाँ भारत का सबसे आधुनिक न्यूक्लियर रिएक्टर है, जिसका नाम है PFBR, प्रोटोटाइप फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर. ये 500 MW बिजली बनाने वाला रिएक्टर है. इसे भारतीय वैज्ञानिकों ने पूरी तरह खुद डिजाइन किया और बनाया है. 6 अप्रैल 2026 को रात 8:25 बजे ये रिएक्टर ‘क्रिटिकल’ हो गया. क्रिटिकल मतलब क्या? मतलब वही कमाल कर दिखाया वैज्ञानिकों ने जिसकी हम बात कर रहे थे. कि ईंधन के कचरे को ही ईंधन बनाने में सफल हो गए. क्रिटिकल होने का मतलब है कि अब न्यूक्लियर रिऐक्शन खुद-ब-खुद चलने लगा है. यानी अब रिएक्टर ऐसे ख़ुद-ब-ख़ुद बिजली बनाने की तरफ एक क़दम और करीब पहुंच गया है. अब समझिए ये क्यों इतना बड़ा काम है। 

भारत का न्यूक्लियर कार्यक्रम तीन चरणों का

भारत का न्यूक्लियर कार्यक्रम तीन चरणों का है. इसे डॉ. होमी भाभा ने बनाया था. पहले चरण में हमारे पुराने रिएक्टर यूरेनियम से बिजली बनाते हैं. इसमें कुछ प्लूटोनियम नाम का पदार्थ बन जाता है, जो कचरा है उनका. दूसरा चरण अब शुरू हो रहा है और ये कल्पक्कम वाला रिऐक्टर उसका हिस्सा है. ये रिऐक्टर उसी प्लूटोनियम वेस्ट को ईंधन की तरह इस्तेमाल करता है. इसलिए ऐसे रिऐक्टर को ‘ब्रीडर’ कहते हैं. क्योंकि ये बिजली भी बनाता है और बिजली बनाने वाला और ईंधन भी बनाता है. और सबसे बड़ी बात ये कि ये जो कचरे से ईंधन बनाता है वो जितना ईंधन डालो उससे ज़्यादा ईंधन बना कर देता है. और साथ में बिजली भी बनाता है. मतलब इसका परीक्षाण सफल तो हो गया अब जब इसको पूरी तैयार कर लिया जाएगा तो एक बार ईंधन डालो, फिर ये खुद अपना ईंधन बढ़ाता रहेगा. इससे देश का कुल ईंधन स्टॉक बढ़ता ही चला जाएगा. ये दूसरा चरण है. इसके बाद आएगा तीसरा चरण. भविष्य में। 

भारत में थोरियम समुद्र के किनारे ढेर सारा पड़ा

उसमें क्या है कि भारत में थोरियम नाम का पदार्थ समुद्र के किनारे ढेर सारा पड़ा है. केरल में, तमिलनाडु में, ओडिशा में, बहुत थोरियम है. अगर ये रिएक्टर कामयाब रहा तो आगे चल कर इस रिएक्टर की मदद से हम थोरियम को भी ईंधन में बदल सकेंगे. भारत के पास यूरेनियम बहुत कम है, लेकिन थोरियम दुनिया में सबसे ज्यादा भारत में है. यानी ये हो गया तो हमें बाहर से महंगा यूरेनियम कम खरीदना पड़ेगा. अपना ही ईंधन बढ़ाकर बिजली बनाएंगे. ये पूरी तरह भारतीय टेक्नॉलजी है. ये हमारे वैज्ञानिकों का कमाल है. जो दूसरे यूरेनियम के रिएक्टर चल रहे हैं उनसे प्लूटोनियम का कचरा निकल रहा है. अब वो कचरा ब्रीडर रिएक्टर में डाल सकते हैं. वो इसका ईंधन बन जाएगा. और फिर ये जो बिजली बनाएगा, उसके साथ फिर कचरा निकलेगा प्लूटोनियम का. उसको फिर डालेंगे रिएक्टर में और वो फिर बिजली बनाएगा. ऐसे करते-करते मतलब थ्योरी में तो ये अनंतकाल तक बिजली बनाता रहेगा क्या? लेकिन ऐसा भी नहीं है. अनंतकाल तक तो नहीं। 

कैसे बिजली बनती रहेगी

थ्योरी में जो होता है उतना पूरा का पूरा प्रैक्टिकल में नहीं होता. लेकिन काफ़ी टाइम तक उसी ईंधन से बिजली बनती रहेगी. और काफ़ी टाइम बाद, काफ़ी बिजली उससे बना लेने के बाद उसमें फ्रेश ईंधन डालना पड़ेगा. लेकिन ये ऐसा कमाल है कि अभी परीक्षण तो सफल हो गया, रिऐक्टर तो क्रिटिकल हो गया, आगे सब कुछ ऐसे ही ठीक-ठाक रहा तो समझ लीजिए बिजली कहां से आएगी इसकी देश को चिंता ही नहीं करनी पड़ेगी इतना बड़ा कमाल हो सकता है ये. और अगर थोरियम का भी इसमें इस्तेमाल हो गया तब तो फिर तो थ्योरी के हिसाब से तो ऊर्जा के लिए आपको सोचना ही नहीं पड़ेगा. थ्योरी तो ये कहती है कि फिर तो समझ लो भारत के पास सूर्य देवता ही आ गए कि लो कितनी बिजली लेनी है ले लो. चला लो उद्योग, चला लो गाड़ियां, चला लो ट्रेनें, पूरा देश दौड़ा दो, और बिजली ही बिजली होगी। 

असली धुरंधर कौन?

स्पाइडरमैन पिक्चर देखी हो अगर आपने तो उसमें वो ये चल रहा होता है ना कि ऐसा परमाणु रिएक्शन हो जाए कि सूरज की तरह हमेशा ऊर्जा मिलती रहे. तो वो तो फ़िल्मी कहानी थी. उस सपने की तरफ़ सबसे बड़ा क़दम बढ़ा दिया है भारतीय वैज्ञानिकों ने. ये इतनी बड़ी उपलब्धि है कि अगर सब कुछ ठीक रहा ना तो कोई नज़र ना लगाए, फिर भारत को कोई रोक नहीं पाएगा. काला टीका लगाना है तो लगा लीजिए, अंग्रेज़ी में कहते हैं ना फ़िगर्स क्रॉस्ड, तो लेट्स कीप अवर फ़िंगर्स क्रॉस्ड. और सलाम कीजिए इस देश के वैज्ञानिकों को. ये IIT, ये IISc, ये ISRO, ये एटॉमिक रिसर्च सेंटर, ये सब भी देश के जवान हैं. ये भी देश को आगे ले जाने की जंग के सिपाही हैं. असली धुरंधर ये हैं. सौ बात की एक बात। 

 

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