भारत के लिए खुशखबरी! अमेरिका-ईरान समझौते के बाद घट सकती हैं LPG, CNG और कई जरूरी चीजों की कीमतें

नई दिल्ली
क्या आप जानते हैं कि खाड़ी देशों में होने वाले तनाव का सीधा असर आपकी रसोई और जेब पर कैसे पड़ता है? जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध चल रहा था तो भारत में सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि दूध, सब्जी से लेकर हवाई टिकट तक सब कुछ महंगा हो गया. लेकिन अब चूंकि यह युद्ध खत्म होने जा रहा है, तो अब क्या-क्या सस्ता होगा? यहां हम उन चीजों की लिस्ट दे रहे हैं। 

 1. रसोई गैस और कमर्शियल सिलेंडर (LPG): भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी खाड़ी देशों से आयात करता है. युद्ध के समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रोपेन और ब्यूटेन (एलपीजी के मुख्य घटक) की कीमतें 800 डॉलर प्रति मीट्रिक टन पार कर गई थीं. तनाव खत्म होने से यह कीमत गिरकर 550-600 डॉलर के दायरे में आ सकती हैं, जिससे घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों में 70 से 100 रुपये तक की कटौती देखने को मिल सकती है. हालांकि सरकार पहले से ही सिलेंडर पर सब्सिडी देती है, तो ऐसे में देखना होगा कि क्या सरकार इसे आम लोगों तक पास करेगी, या नहीं। 

2. विदेशी फल और ड्राई फ्रूट्स (खजूर और अंजीर): भारत सालाना करीब 90 हजार से 1 लाख मीट्रिक टन खजूर ईरान और खाड़ी देशों से मंगाता है. समुद्री नाकेबंदी के कारण भारतीय थोक बाजारों में कीमिया और मजलूम खजूर के दाम 35 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गए थे. रूट खुलते ही सप्लाई सामान्य होने से इनके थोक और रिटेल दामों में 25 से 30 फीसदी की सीधी गिरावट आने की संभावना है। 

3. सीएनजी और पीएनजी (CNG & PNG): भारत अपनी कुल नेचुरल गैस की जरूरत का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा (LNG के रूप में) कतर और यूएई जैसे देशों से इम्पोर्ट करता है. युद्ध के डर से स्पॉट एलएनजी की कीमतें 15-18 डॉलर प्रति mmBtu (Million British Thermal Units) तक पहुंच गई थीं. अब वैश्विक बाजार में गैस की कीमत घटकर 9-10 डॉलर प्रति mmBtu के स्तर पर आने की संभावना है, जिससे घरेलू स्तर पर सीएनजी और पीएनजी के दाम 4 से 6 प्रति किलो/Scm तक सस्ते हो सकते हैं। 

 4. रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizers): भारत सालाना लगभग 70 से 80 लाख टन यूरिया और फॉस्फेटिक खादों का आयात करता है, जिसमें ओमान और सऊदी अरब की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. सप्लाई चेन टूटने से प्रति टन आयात लागत में 50 से 70 डॉलर का उछाल आया था. होर्मुज रूट खुलने से फर्टिलाइजर कंपनियों की इनपुट कॉस्ट 12 से 15 प्रतिशत तक कम होगी, जिससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ घटेगा और खुले बाजार में खाद की किल्लत खत्म होगी। 

5. प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्रियां (Polymers): भारतीय प्लास्टिक उद्योग अपनी जरूरत का लगभग 40% पॉलीमर और प्लास्टिक दाना खाड़ी देशों की पेट्रोकेमिकल रिफाइनरियों से मंगाता है. कच्चे तेल के 125 डॉलर होने से पॉलिमर के दाम 20% तक महंगे हो गए थे. कच्चे तेल की कीमतें 75-80 डॉलर के सामान्य स्तर पर आने से प्लास्टिक इनपुट कॉस्ट में 15% तक की कमी आएगी, जिससे पैकेजिंग मैटेरियल सीधे सस्ते होंगे। 

6. हवाई सफर (Air Tickets): किसी भी एयरलाइंस कंपनी के कुल ऑपरेटिंग खर्च का 40% हिस्सा अकेले एटीएफ (Aviation Turbine Fuel) पर खर्च होता है. क्रूड के 125 डॉलर पार जाने से एटीएफ की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर थीं. कच्चे तेल में गिरावट के बाद एटीएफ की कीमतों में 10% से 12% की कटौती तय है, जिससे एयरलाइंस कंपनियां हवाई किराए (Airfares) में 8% से 10% तक की कमी कर सकती हैं। 

7. स्क्रैप मेटल और रीसाइक्लिंग उत्पाद: भारत यूएई और खाड़ी देशों से हर साल लाखों टन एल्युमिनियम और कॉपर स्क्रैप इम्पोर्ट करता है. युद्ध के दौरान समुद्री जहाजों का भाड़ा (Freight Rate) और वॉर रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम 300% तक बढ़ गया था. शिपिंग रूट सामान्य होने से माल ढुलाई का भाड़ा 30% तक कम होने की संभावना है, जिससे घरेलू रिसाइक्लिंग यूनिट्स को कच्चा माल 8 से 10 प्रतिशत सस्ता मिलेगा। 

8. इंडस्ट्रियल सल्फर (Industrial Sulfur): रबर और केमिकल इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी सल्फर का भारत एक बड़ा आयातक है. खाड़ी देशों से सप्लाई रुकने से भारत में सल्फर की घरेलू कीमतें 18% से 22% तक उछल गई थीं. रिफाइनरियों में उत्पादन सामान्य होने और शिपमेंट शुरू होने से इंडस्ट्रियल सल्फर के दाम 15% तक नीचे आ सकते हैं। 

 9. पेंट्स और कोटिंग्स (Paints & Solvents): पेंट्स बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (जैसे रेजिन और सॉल्वैंट्स) का करीब 50% हिस्सा पेट्रोकेमिकल डेरिवेटिव्स होता है. कच्चे तेल और गैस के दाम टूटने से पेंट कंपनियों की कुल मैन्युफैक्चरिंग लागत में 6 से 8 प्रतिशत की कमी आएगी, जिसका सीधा फायदा वे उपभोक्ताओं को कीमतों में कटौती या डिस्काउंट के रूप में देंगी। 

10. ऑनलाइन डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स सेवाएं: भारत का लॉजिस्टिक्स इंडेक्स सीधे तौर पर ईंधन और परिचालन लागत से जुड़ा है. वैश्विक ऊर्जा संकट थमने से माल ढुलाई इंडेक्स (Freight Index) में 7 से 10 फीसदी की गिरावट आने का अनुमान है. इसका सीधा असर ई-कॉमर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों पर पड़ेगा, जिससे डिलीवरी चार्जेस और कूरियर फीस में 5 से 8 प्रतिशथ तक की राहत मिल सकती है। 

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