E10 की तर्ज पर अब जहाजों में भी बायोफ्यूल! 10% ब्लेंडिंग के लिए सरकार का बड़ा रोडमैप

मुंबई 

Biofuel Blend in Marine Fuel: देश में E20 पेट्रोल को लेकर बहस जारी है. सवाल पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से लेकर इंजन की सेहत, माइलेज और फ्यूल की क्वॉलिटी तक पहुंच चुका है. इस बीच सरकार ने मरीन फ्यूल यानी समुद्री जहाजों में इस्तेमाल होने वाले फ्यूल में बड़ा बदलाव करने की तैयारी की है. जहाजों से निकलने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए बायोफ्यूल और उसके ब्लेंड को बढ़ावा देने का रोडमैप सामने आया है. यानी जहां देश में पेट्रोल के हर प्रतिशत इथेनॉल पर बहस हो रही है, वहां अब समुद्री जहाजों के फ्यूल में भी बायोफ्यूल की हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी हो रही है. आइये जानें क्या है पूरा मामला। 

सरकार ने समुद्री इलाकों में कम कार्बन वाले और रिन्यूएबल फ्यूल के इस्तेमाल को धीरे-धीरे बढ़ाने के लिए एक ड्राफ्ट रोडमैप जारी किया है. इस ड्राफ्ट का मकसद जहाजों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों में कमी लाना और इंडियन कोस्टल वाटर्स में चलने वाले जहाजों को ज्यादा क्लीन फ्यूल की ओर ले जाना है। 

डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ मरीन एडमिनिस्ट्रेशन यानी DGMA की ओर से बुधवार को जारी दस्तावेज में कहा गया है कि, बायोफ्यूल और इसके ब्लेंडिंग मरीन ट्रांसपोर्टेशन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने का एक आसान और किफायती रास्ता हो सकता है. खास बात यह है कि ऐसे फ्यूल का इस्तेमाल करने के लिए मौजूदा जहाजों के फ्यूल सिस्टम में बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

सरकार का मानना है कि ड्रॉप-इन बायोफ्यूल को ट्रेडिशनल मरीन फ्यूल के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने से जहाजों के लाइफ साइकिल ग्रीनहाउस गैस इमिशन को कम किया जा सकता है. आसान भाषा में समझें तो फ्यूल ब्लेंडिंग से इन जहाजों से होने वाले पॉल्यूशन को कम किया जा सकता है. इसके अलावा मौजूदा जहाजों को पूरी तरह नए सिस्टम में बदलने के बजाय धीरे-धीरे बायोफ्यूल ब्लेंड की तरफ ले जाना ज्यादा आसान होगा। 

DGMA ने “10% बायोफ्यूल ब्लेंड” का प्रस्ताव रखा है, यानी समुद्री जहाजों में इस्तेमाल होने वाले होमोजीनियस मरीन फ्यूल में मात्रा के हिसाब से कम से कम 10% बायोफ्यूल होना चाहिए. DGMA के मुताबिक “सस्टेनेबल बायोफ्यूल” वह फ्यूल है, जो तय मानकों वाले फीडस्टॉक से सर्टिफाइड और एक्सेप्टेड प्रोसेस के जरिए तैयार किया गया हो और जिसके प्रोडक्शन सोर्स, ट्रेसबिलिटी और पूरे लाइफ साइकिल में होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की पूरी जानकारी डॉक्यूमेंट के साथ साबित की गई हो। 

कब से लागू होगा ये नियम
इस प्रस्ताव के तहत 1 जनवरी 2028 से इंडियन कोस्टल बिजनेस में लगे सभी जहाजों को MGO, VLSFO या FO के साथ मात्रा के हिसाब से 10% तक बायोफ्यूल ब्लेंड इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. हालांकि यह फ्यूल की उपलब्धता, उसकी कम्पैटिबिलिटी, सेफ्टी, इंजन या कंपोनेंट मैन्युफैचर्स की सलाह और लागू कानूनी नियमों पर निर्भर करेगा। 

इस दौरान जहाज मालिकों, ऑपरेटरों और चार्टरर्स को बायोफ्यूल ब्लेंड की खरीदारी की व्यवस्था करने, फ्यूल की कम्पैटिबिलिटी और स्टेबिलिटी की जांच, जहाज पर फ्यूल के मैनेजमेंट और स्टोरेज की तैयारी, क्रू को ट्रेनिंग देने, फ्यूल की खपत और मशीनरी के परफॉर्मेंस पर नजर रखने और बायोफ्यूल के इस्तेमाल से जुड़े उचित रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था धीरे-धीरे तैयार करनी होगी। 

DGMA के मुताबिक 1 जनवरी 2029 से इस नोटिस के दायरे में आने वाले इंडियन कोस्टल ट्रेड में लगे हर जहाज के लिए प्रोपल्शन और ऑक्जिलरी मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले मरीन फ्यूल में मात्रा के हिसाब से कम से कम 10% बायोफ्यूल होना जरूरी होगा. DGMA का कहना है कि, यह पहल नेशनल मैरीटाइम डीकार्बोनाइजेशन पॉलिसी फ्रेमवर्क यानी NMDPF, नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स 2018 और भारत के एन्वॉयरमेंटल टार्गेट के अनुरूप है. इस नए नियम को फेज़्ड मैनर में लागू किया जाएगा, जिसके लिए बायोफ्यूल ब्लेंड के इस्तेमाल का एक पूरा स्ट्रक्चर तैयार किया गया है। 
 
किन समुद्री जहाजों पर लागू होगा नियम
DGMA के दस्तावेज के अनुसार ब्लेंडिंग का प्रपोजल मरीन गैस ऑयल (MGO), वेरी लो सल्फर फ्यूल ऑयल (VLSFO) और फ्यूल ऑयल (FO) जैसे ट्रेडिशनल मरीन फ्यूल का इस्तेमाल करने वाले जहाजों पर लागू होगा. इसमें जहाजों के प्रोपल्शन यानी आगे बढ़ने वाले सिस्टम और असिस्टेड मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले रेजिडुअल मरीन फ्यूल ग्रेड भी शामिल हैं। 

इस नए इंफ्रा का असर केवल जहाज मालिकों तक सीमित नहीं रहेगा. नियमों के दायरे में जहाज मालिक, शिप मैनेजर, ऑपरेटर, चार्टरर, मास्टर, बंकर सप्लायर, फ्यूल प्रोड्यूसर और ब्लेंडर समेत समुद्री फ्यूल की खरीद, ब्लेंडिंग, सप्लाई, बंकरिंग और इस्तेमाल से जुड़े दूसरे पक्ष भी आएंगे. DGMA ने साफ किया है कि ये प्रावधान इंडियन कोस्टल बिजनेस में लगे जहाजों पर लागू होंगे. इससे समुद्री क्षेत्र में बायोफ्यूल के इस्तेमाल को धीरे-धीरे बढ़ाने और ट्रेडिशनल फ्यूल पर निर्भरता कम करने का रास्ता तैयार हो सकता है। 

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