मक्का रक्षा समझौते में शामिल हो सकता है बांग्लादेश, पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका से भारत की टेंशन बढ़ी

ढाका
दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नए रक्षा समीकरण की चर्चा तेज हो गई है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने इसी महीने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस डील को कुछ विश्लेषक ‘इस्लामिक NATO’ कह रहे हैं। इसकी वजह यह है कि समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने को सभी सदस्यों पर हमला माना गया है। हालांकि, यह अभी NATO जैसा औपचारिक सैन्य संगठन नहीं है। समझौते का मकसद सदस्य देशों के बीच डिफेंस, सिक्योरिटी और मिलिट्री साझेदारी को मजबूत करना बताया गया है। पाकिस्तान ने इसे भविष्य में इस्लामी देशों के रक्षा सहयोग के मॉडल के रूप में भी पेश किया है।

अब इस गठबंधन का दायरा बढ़ाने की कोशिशों जारी हैं। इस बीच, बांग्लादेश ने भी इसमें शामिल होने का विकल्प खुला रखा है। बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने कहा कि ढाका बदलते वैश्विक हालात, आर्थिक हितों और राष्ट्रीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ऐसे किसी आर्थिक या रक्षा ढांचे में शामिल होने के विकल्प पर विचार कर सकता है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी सहयोगी ने भी मक्का समझौते जैसे किसी समूह में बांग्लादेश की भागीदारी का समर्थन किया है। यानी फिलहाल बांग्लादेश के शामिल होने का अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन ढाका की दिलचस्पी साफ दिखाई दे रही है।

बांग्लादेश को क्या होगा लाभ
बांग्लादेश के इस रुख के पीछे उसकी बदलती विदेश नीति को अहम माना जा रहा है। ढाका पिछले कुछ समय से भारत और चीन के बीच संतुलन साधने के साथ-साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। रक्षा क्षेत्र में भी बांग्लादेश की पाकिस्तान और तुर्किये के साथ बढ़ती नजदीकी दिखाई दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, ढाका पाकिस्तान-चीन की ओर से विकसित जेएफ-17 लड़ाकू विमानों की खरीद पर भी विचार कर रहा है। ऐसे में मक्का रक्षा समझौते से जुड़ना बांग्लादेश को सैन्य सहयोग और रणनीतिक साझेदारी का नया विकल्प दे सकता है।

क्या भारत के लिए चिंता की बात
भारत के लिए चिंता का सबसे बड़ा पहलू पाकिस्तान की भूमिका है। अगर बांग्लादेश 'इस्लामिक नाटो' में शामिल होता है, तो पाकिस्तान को दक्षिण एशिया में एक और देश के साथ सुरक्षा सहयोग का मंच मिल सकता है। इससे भारत की पूर्वी सीमा के आसपास नई रणनीतिक परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। हालांकि, इसे तुरंत भारत के खिलाफ बने सैन्य गठबंधन के रूप में देखना सही नहीं होगा। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के अपने-अपने सुरक्षा हित हैं। जानकारों का मानना है कि अलग-अलग देशों की प्राथमिकताओं के कारण इस समझौते का NATO जैसा एकीकृत सैन्य ढांचा बनना आसान नहीं है। फिर भी भारत को बांग्लादेश-पाकिस्तान-तुर्किये के बढ़ते रक्षा संबंधों और हिंद महासागर क्षेत्र में इसके संभावित प्रभाव पर नजर रखनी होगी।

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