महाकाली में अक्षय खन्ना बनेंगे शुक्राचार्य, जानें असुर गुरु की पूरी कहानी

डायरेक्टर प्रशांत वर्मा की फिल्म महाकाली एकबार फिर चर्चा में आ गई है. दरअसल, फिल्म मेर्कस ने हाल ही में अक्षय खन्ना का एक नया लुक जारी किया है, जिसे देखकर इंटरनेट पर हलचल मच गई है. पिछले साल, धुरंधर के रिलीज होने के बाद महाकाली का फर्स्ट लुक पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. उस पोस्टर के मुताबिक, फिल्म महाकाली में अक्षय खन्ना असुर गुरु शुक्राचार्य का रोल निभाते नजर आएंगे. पौराणिक कथाओं और पुराणों के मुताबिक, शुक्राचार्य असुरों के गुरु थे. साथ ही, शुक्राचार्य को महान ऋषियों में से एक माना जाता है, जो बहुत ही विद्वान और ज्ञानी थे.

कौन थे गुरु शुक्राचार्य?
पुराणों के मुताबिक, गुरु शुक्राचार्य ने देवताओं को प्रसन्न करने और उनसे शक्तियां प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक तपस्या और साधना की थी. उन्होंने इसी साधना से कई मंत्रों और औषधियों का ज्ञान भी हासिल किया था और बाद में यही ज्ञान अपने शिष्यों को भी सिखाया था.

वहीं, वैदिक ज्योतिष में शुक्राचार्य का संबंध शुक्र ग्रह से माना जाता है. शुक्र नवग्रहों में से एक है. और वृषभ-तुला राशि का स्वामी माना जाता है. ज्योतिष में शुक्र को प्रेम, सौंदर्य, कला, भौतिक सुख, आकर्षण और संतान से जुड़ा ग्रह भी माना जाता है.

गुरु शुक्राचार्य महर्षि भृगु और माता ख्याति (माता काव्या) के पुत्र थे. कुछ किवदंतियों में ऐसा जिक्र मिलता है कि शुक्राचार्य ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए महान ऋषि अंगिरा के आश्रम में प्रवेश लिया था. वहां उन्होंने ऋषि अंगिरा के पुत्र बृहस्पति के साथ रहकर शिक्षा ग्रहण की थी. लेकिन शुक्राचार्य को महसूस हुआ कि ऋषि अंगिरा अपने पुत्र बृहस्पति को उनसे अधिक महत्व देते हैं. इस बात से दुखी होकर शुक्राचार्य ने ऋषि अंगिरा का आश्रम छोड़ दिया था. इसके बाद उन्होंने महान ऋषि गौतम से शिक्षा प्राप्त की थी.

पौराणिक कथाओं के मुताबिक, गुरु शुक्राचार्य के चार पुत्र थे. जिनका नाम चंड, अमर्क, त्वाष्ट्र और धरात्र बताया जाता है. वहीं, उनकी दूसरी पत्नी से उनकी एक पुत्री हुई थी, जिसका नाम देवयानी था. कुछ कथाओं में देवयानी को इंद्र की पुत्री भी बताया गया है.
चलिए अब जानते हैं कि क्यों गुरु शुक्राचार्य भगवान विष्णु के शत्रु बन गए थे.

 गुरु शुक्राचार्य की भगवान विष्णु से शत्रुता
देवी भागवत पुराण के मुताबिक, एक बार एक युद्ध के दौरान देवता असुरों पर भारी पड़ रहे थे. अपनी रक्षा के लिए असुर महर्षि भृगु के आश्रम में पहुंचे थे. संयोग से उस समय महर्षि भृगु और गुरु शुक्राचार्य आश्रम में मौजूद नहीं थे और वहां केवल माता ख्याति (काव्या) ही मौजूद थी. माता ख्याति को देखते ही सभी असुरों ने उनसे अपनी रक्षा का अनुरोध किया. माता काव्या ने अतिथि धर्म निभाते हुए उन्हें आश्रय दे दिया था.

कहा जाता है कि माता काव्या इतनी शक्तिशाली थी कि उन्होंने असुरों की मदद करने के लिए अपने आश्रम के चारों ओर एक मजबूत और अदृश्य कवच का निर्माण कर दिया था. देवता भी इस सुरक्षा कवच को भेद नहीं पा रहे थे. इसके बाद जैसे ही माता काव्या ने देवताओं की ओर देखा, तो सभी देवता तुरंत बेहोश हो गए थे. तब सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगी थी. ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र को माता काव्या का सुरक्षा कवच तोड़ने और उनका वध करने का आदेश दिया था.

जब महर्षि भृगु को इस घटना के बारे में पता चला तो वे बहुत क्रोधित हो गए थे. उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि उन्हें पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेना होगा और अपनी पत्नी से वियोग का दुख सहना पड़ेगा. उसके बाद जब शुक्राचार्य को अपनी माता की मृत्यु के बारे में पता चला तो वे भगवान विष्णु से बेहद नाराज हुए थे. मान्यता है कि इसी कारण उन्होंने असुरों को भगवान विष्णु की पूजा करने से रोक दिया था और फिर वह देवताओं के बजाय असुरों का साथ देने लगे थे.

मृत संजीवनी मंत्र
भागवत पुराण के मुताबिक, एक युद्ध में असुरों की हार से गुरु शुक्राचार्य बहुत दुखी और क्रोधित हो गए थे. जिसके बाद उन्होंने देवताओं को हराने के उद्देश्य से भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी थी. कहा जाता है कि उन्होंने यह तपस्या सिर नीचे और पैर ऊपर करके की थी.

जब देवराज इंद्र को शुक्राचार्य की कठिन तपस्या के बारे में पता चला, तो उन्होंने अपनी पुत्री जयंती को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा था. लेकिन जयंती की सभी कोशिशें असफल रहीं, क्योंकि शुक्राचार्य अपनी साधना में इतने लीन थे कि उन्होंने उसकी ओर कोई ध्यान तक नहीं दिया था.

जिसके बाद गुरु शुक्राचार्य की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा था. तब गुरु शुक्राचार्य ने भगवान शिव से संजीवनी मंत्र का ज्ञान मांगा था. यह ऐसा मंत्र माना जाता है, जिसके जरिए मृत व्यक्ति को दोबारा जीवित किया जा सकता था. भगवान शिव ने उन्हें संजीवनी मंत्र का ज्ञान तो दिया, लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी कि इसका गलत इस्तेमाल न किया जाए. इसके बाद गुरु शुक्राचार्य ने इस मंत्र का उपयोग असुरों के लिए किया था. मान्यता है कि वे युद्ध में मारे गए असुरों को संजीवनी मंत्र की मदद से दोबारा जीवित करते थे, जिससे असुर फिर से देवताओं के खिलाफ युद्ध कर सकें.

कैसे पड़ा था नाम शुक्राचार्य?
एक बार असुरों और भगवान शिव की सेना के बीच युद्ध हुआ था. भगवान शिव की पूरी सेना की कमान नंदी के हाथों में थी. इस युद्ध में देवताओं ने भी भगवान शिव की सेना की मदद की थी. लेकिन, असुरों की सेना की संख्या इतनी ज्यादा थी कि वह युद्ध जीत रहे थे. स्थिति बिगड़ती देख नंदी देवताओं के साथ भगवान शिव के पास सहायता मांगने पहुंचे. जब भगवान शिव को पता चला कि गुरु शुक्राचार्य ने संजीवनी मंत्र का गलत इस्तेमाल किया है, तो उन्होंने शुक्राचार्य को निगल लिया और अपने पेट में रख लिया.

 

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