रोजगार का नया दौर! भारत में बढ़े फ्रीडम वाले जॉब्स, काम के साथ कमाई भी कर रहे युवा

 नई दिल्ली

आज कंपटिशन के दौर में डॉक्टर इंजीनियर या टीचर का कर‍ियर अपनाना मुश्क‍िल हो गया है.वहीं सरकारी नौकरियां, जो निश्च‍ितता देती हैं वहां पेपर लीक से  लेकर कोच‍िंग इंडस्ट्री के लंबे खर्चे तक तमाम अन‍िश्च‍ितताएं हैं. अब बचता है जॉब… तो इंड‍िया में जॉब पाना तो आसान हो गया है. आपको कोई भी बेसिक काम जैसे ड्राइव‍िंग, कुकिंग या घरेलू काम आते हैं तो आप तुरंत किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जॉब पा सकते हैं. लेकिन ये करियर या नौकरी तो नहीं कहलाएगी. एक तरह से देखा जाए तो ये अमेरिकी ट्रेंड है जहां लोग ग‍िग वर्क करके अपने खर्चे न‍िकाल लेते हैं. लेकिन भारत में इस पर  लोगों की लाइफ डिपेंड होती जा रही है। 

मार्केट में घटते जॉब, ले-ऑफ के खतरे, एआई का मार्केट, महंगाई और परिवार की जिम्मेदारी ने लोगों को ग‍िग वर्क के लिए मजबूर कर दिया है. लोग अब केवल नौकरी तक खुद को सीमित नहीं रख रहे हैं. नौकरी करने के साथ ही वह अब अमेरिका के वर्क कल्चर यानी गिग वर्कर के ट्रेंड को फॉलो कर रहे हैं. वह खाली समय का भी यूज कर रहे हैं। 

2026 के एक Indeed सर्वे में 68% भारतीय कर्मचारियों ने कहा कि उनकी मौजूदा आय आराम से जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं है, जो साइड इनकम की बढ़ती जरूरत को समझने में मदद करता है. लेकिन केवल सैलरी ही इस काम को करने का अहम कारण नहीं माना बल्कि गिग वर्क को फ्रीडम के साथ काम करने का मौका देता है. ऐसे में भारत का बदलता वर्क कल्चर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है क्या कर्मचारी अब एक नौकरी के बजाय कमाई के कई रास्तों को अपना भविष्य मानने लगे हैं? भारत में गिग इकोनॉमी के बढ़ने का अंदाजा सरकारी आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है. नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक 2020-21 में देश में करीब 77 लाख यानी 7.7 मिलियन गिग वर्कर्स थे. यह संख्या 2029-30 तक बढ़कर 2.35 करोड़ यानी 23.5 मिलियन होने का अनुमान है। 

अमेरिका में कैसा है गिग वर्कर का काम? 
अमेरिका में गिग और वैकल्पिक काम का दायरा केवल डिलीवरी या कैब चलाने तक सीमित नहीं है. इसमें स्वतंत्र कॉन्ट्रैक्टर, फ्रीलांसर, ऑन-कॉल वर्कर, टेंपरेरी वर्क और ऐप के जरिए मिलने वाला काम भी शामिल होते हैं. अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स (BLS) के जुलाई 2023 के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में 7.4% कामगार अपने मुख्य या एकमात्र काम में स्वतंत्र कांट्रेक्टर थे. वहीं 4.3% कामगार contingent jobs में थे, यानी ऐसी नौकरियां जिनके लंबे समय तक चलने की उम्मीद नहीं होती। 

अमेरिका में इस तरह के काम को लेकर सबसे बड़ा मुद्दा फ्लेक्सिबिलिटी बनाम नौकरी की सुरक्षा है. स्वतंत्र कॉन्ट्रैक्टर को काम करने की ज्यादा आजादी मिल सकती है, लेकिन कर्मचारी के तौर पर मिलने वाले कुछ लाभ और सुरक्षा उन्हें नहीं मिलते. अमेरिका में केवल गिग वर्कर केवल ऐप के जरिए कैब चलाने या सामान पहुंचाने तक ही नहीं है. इसमें फ्रीलांसर, स्वतंत्र सलाहकार (Consultant) और दूसरे काम भी शामिल होते हैं. BLS के अनुसार, आर्ट्स, डिजाइन,  मनोरंजन, खेल और मीडिया से जुड़े कामों में हिस्सेदारी सबसे अधिक है। 

भारत में क्यों बढ़ रहा है इसका ट्रेंड?
भारत में इसके बढ़ने की कई सारी वजहें हैं. स्मार्टफोन और इंटरनेट की आसान उपलब्धता, ऑनलाइन पेमेंट, ई-कॉमर्स, फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स ने ऐसे कामों के अवसर बढ़ाए हैं. डिलीवरी पार्टनर, कैब ड्राइवर, फ्रीलांसर, घरेलू सेवाएं देने वाले कर्मचारी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़े दूसरे कामगार अब इस नए वर्क कल्चर का हिस्सा बन रहे हैं. नीति आयोग के मुताबिक भारत में गिग वर्क का बड़ा हिस्सा मध्यम कौशल वाले कामों में है. 2020-21 में करीब 47% गिग वर्क मीडियम-स्किल्ड, 22% हाई-स्किल्ड और 31% लो-स्किल्ड कामों में था. भारत में गिग वर्कर्स को लेकर सरकार ने कानूनी स्तर पर भी कदम उठाए हैं.सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में पहली बार गिग वर्कर और प्लेटफॉर्म वर्कर की परिभाषा और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रावधान किया गया है। 

क्या भारत अमेरिका के रास्ते पर चल रहा है?
काफी हद तक वर्क कल्चर में समानता जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन दोनों देशों की परिस्थितियां अलग हैं. अमेरिका में गिग वर्क का बड़ा हिस्सा स्वतंत्र कॉन्ट्रैक्ट और फ्रीलांस मॉडल से जुड़ा है, जबकि भारत में ऐप आधारित डिलीवरी, कैब और क्विक-कॉमर्स जैसे काम तेजी से दिखाई दे रहे हैं. भारत में गिग इकोनॉमी के सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ रोजगार बढ़ने का नहीं है बल्कि कमाई की स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा, दुर्घटना बीमा और काम की बेहतर परिस्थितियों का भी है. इसलिए आने वाले सालों में भारत में गिग वर्क का विस्तार कितना बड़ा होगा, यह सिर्फ ऐप और कंपनियों की संख्या पर निर्भर नहीं करेगा. सरकार की नीतियां, प्लेटफॉर्म कंपनियों की जिम्मेदारी और कामगारों को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा भी इस नए वर्क कल्चर की दिशा तय करेगी। 

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