ऐतिहासिक संवैधानिक सुनवाई, क्या महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदल देगा सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानून

नई दिल्ली
2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। कोर्ट ने कहा था कि भक्ति को लैंगिक भेदभाव का शिकार नहीं बनाया जा सकता।

सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री पर SC की 9 जजों की पीठ करेगी सुनवाई, मस्जिदों पर भी होगा असर
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से शुरू हुआ विवाद अब एक ऐतिहासिक संवैधानिक मोड़ पर खड़ा है। 7 अप्रैल 2026 से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ उन व्यापक कानूनी सवालों पर सुनवाई शुरू करने जा रही है। यह न केवल हिंदू धर्म, बल्कि मुस्लिम, पारसी और दाऊदी बोहरा समुदायों की धार्मिक प्रथाओं को भी प्रभावित करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट की यह पीठ केवल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर विचार नहीं कर रही है। अदालत के सामने असल चुनौती यह तय करना है कि क्या व्यक्तिगत मौलिक अधिकार किसी समुदाय के धार्मिक अधिकारों से ऊपर हैं। इस फैसले का असर मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकारों और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित प्रथाओं पर भी पड़ेगा।

2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। कोर्ट ने कहा था कि भक्ति को लैंगिक भेदभाव का शिकार नहीं बनाया जा सकता। एकमात्र महिला जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने तब असहमति जताते हुए कहा था कि धार्मिक प्रथाओं की तर्कसंगतता की जांच करना अदालतों का काम नहीं है। नवंबर 2019 में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पाया कि यह मुद्दा बहुत व्यापक है और इसे बड़ी बेंच (9 जजों) को भेज दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने कई सवाल
संविधान पीठ कुछ मुद्दों पर स्पष्टता लाने की कोशिश कर सकती है। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है? अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच तालमेल कैसे बैठेगा? क्या धार्मिक संप्रदाय के अधिकार संविधान के 'भाग-III' (मौलिक अधिकार) के अधीन हैं? अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त 'नैतिकता' शब्द का अर्थ क्या है? क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता शामिल है? क्या अदालतें यह तय कर सकती हैं कि कोई धार्मिक प्रथा उस धर्म का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं? अनुच्छेद 25(2)(b) में हिंदुओं के वर्गों का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या कोई व्यक्ति जो उस विशेष धार्मिक संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, उसकी प्रथाओं को कोर्ट में चुनौती दे सकता है?

अन्य धर्मों पर भी होगा असर
यह सुनवाई इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इसमें कई अन्य विवादों को जोड़ दिया गया है। मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश का अधिकार। दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित 'बहिष्कार' और अन्य प्रथाओं की वैधता। गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के 'अग्नि मंदिर' में प्रवेश का अधिकार। आपको बता दें कि अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई जैन संगठनों ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है, क्योंकि कोर्ट का फैसला उनके व्यक्तिगत कानूनों को प्रभावित कर सकता है।

नई बेंच का गठन
CJI सूर्य कांत के नेतृत्व वाली इस बेंच में विविधता का ध्यान रखा गया है। इसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना सहित देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों से आए अनुभवी जज शामिल हैं। 7 अप्रैल से होने वाली यह दैनिक सुनवाई भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्याओं में से एक साबित होगी। अदालत के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म मानने की आजादी देता है, लेकिन साथ ही यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कोई भी प्रथा जो महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है, वह धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं हो सकती। धार्मिक संस्थाओं का तर्क है कि धर्म की अपनी आंतरिक स्वायत्तता होती है और अदालतों को सदियों पुरानी परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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