मक्का समझौते की पहली अग्निपरीक्षा! Aramco रिफाइनरी पर हूतियों का हमला, पाकिस्तान-तुर्की की भूमिका पर

रियाद
 सऊदी अरब
ने जिस खतरे के डर से मक्का समझौता किया था, वो खतरा अब कहर बनकर टूट पड़ा है. आज से पक्के दोस्त का दिखा कर रहे पाकिस्तान-तुर्की की अग्नि परीक्षा शुरू हो गई है. सऊदी अरब में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी ‘अरामको’ की रिफाइनरी पर एक बार फिर हूती विद्रोहियों का कहर टूटा है. यमन के ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने दक्षिणी सऊदी अरब के जिजान इलाके में मौजूद अरामको रिफाइनरी पर दो-दो ड्रोन से सटीक हमला करने का दावा किया है. मक्का समझौते के बाद सऊदी पर ये पहला अटैक है, ऐसे में दुनिया की नजरें पाकिस्तान और तुर्की की तरफ मुड़ गई हैं। 

हूतियों के Aramco अटैक के बाद पाकिस्तान-तुर्की की अग्निपरीक्षा
यमन में बैठे ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने एक बार फिर सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्से में मौजूद अरामको रिफाइनरी को अपना निशाना बनाया है. हूती विद्रोहियों का दावा है कि ये हमला लगातार तीसरी बार किया गया है और ये बिल्कुल सटीक निशाने पर लगा है. इस हमले के बाद पूरे मरुस्थल में सन्नाटा है और सऊदी अरब का तेल नेटवर्क एक बार फिर भारी दबाव में आ गया है। 

इस हमले के बाद सऊदी के संकट मोचक बनने का दावा करने वाले पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों की असलियत सामने आने वाली है, वहीं ऐतिहासिक ‘मक्का समझौते’ की भी सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होने जा रही है। 

क्यों हुआ हमला? हूती विद्रोहियों ने दी खुली धमकी
हूती विद्रोहियों की सैन्य विंग के हवाले से सबा एजेंसी ने रिपोर्ट किया है कि ये हमला कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है. हूतियों का आरोप है कि सऊदी अरब ने यमन के सादा और हज्जा प्रांतों में उनके एयरस्पेस का उल्लंघन किया और देश की संप्रभुता को चुनौती दी. हूती प्रवक्ताओं ने चेतावनी दी है कि वो यमन की सीमाओं पर होने वाले किसी भी हमले का करारा जवाब देंगे. उन्होंने साफ कर दिया है कि अगर सऊदी अरब की तरफ से कोई भी आक्रामक कार्रवाई होती है तो उसका जवाब इसी तरह के मिसाइल और ड्रोन हमलों से दिया जाएगा। 

क्या टूट गया यमन का सालों पुराना सीजफायर?
इस हमले के साथ ही ये लगभग साफ हो गया है कि यमन में पिछले कुछ सालों से चला आ रहा सीजफायर अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है. यमन के गृहयुद्ध में एक तरफ सऊदी समर्थित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार थी तो दूसरी तरफ ईरान समर्थित हूती विद्रोही। 

दोनों पक्षों के बीच जारी सीजफायर पिछले महीने ही उस वक्त डगमगा गया था जब अमेरिका और ईरान के क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच सीधी भिड़ंत बढ़ गई. हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी का ऐलान कर दिया और लाल सागर में सऊदी अरब के तेल टैंकरों पर हमले तेज कर दिए. जिजान रिफाइनरी पर हुआ ये नया हमला उसी कड़ी का हिस्सा है। 

होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर लाल सागर तक बिछा बारूद
एक तरफ हूती विद्रोही लाल सागर और सऊदी तेल ठिकानों को निशाना बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर रखा है। 

ये समुद्री रास्ता दुनिया के तेल व्यापार की रीढ़ की हड्डी माना जाता है. तेहरान और वाशिंगटन के बीच जारी तनाव ने इस रास्ते को दुनिया का सबसे खतरनाक मोड़ बना दिया है. ऐसे में अगर सऊदी अरब के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार हमले होते रहे, तो पूरे यूरोप और एशिया में ईंधन का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। 

अब पता चलेगी पाकिस्तान और तुर्की की असलियत!
पाकिस्तान हमेशा से खुद को रियाद का सबसे बड़ा रणनीतिक और सैन्य रक्षक बताता आया है. जब भी सऊदी अरब की सुरक्षा पर बात आती है, इस्लामाबाद बड़े-बड़े दावे करता ह  लेकिन जब ईरान समर्थित हूती विद्रोही सीधी चुनौती दे रहे हैं, तब क्या पाकिस्तान अपनी सेना या रणनीतिक मदद सऊदी अरब के बचाव में भेजेगा? या फिर वो ईरान के डर से पीछे हट जाएगा? इस हमले ने पाकिस्तान की कागजी बयानबाजी और जमीनी हकीकत का अंतर साफ कर दिया है। 

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन खुद को मुस्लिम अमहियत का लीडर साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. तुर्की के ड्रोन और सैन्य तकनीक की दुनिया भर में चर्चा होती है. लेकिन सऊदी अरामको पर हुए इस हमले के बाद तुर्की क्या रुख अपनाता है, इस पर पूरी दुनिया की नजरें हैं. तुर्की का ईरान के साथ भी कारोबारी रिश्ता है और सऊदी अरब के साथ भी वह संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है. अब तुर्की को चुनना होगा कि वो सऊदी के साथ खड़ा होता है या खलीफा बनने का नाटक करता रहेगा है। 

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