वंदे मातरम् के सम्मान पर सख्त कानून, जानिए गायन रोकने या बाधा डालने पर क्या होगा अंजाम

नई दिल्ली
 राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' के गायन को लेकर देशभर की सियासत में गर्माहट तेज है। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति भी सातवें आसमान पर पहुंच गई है। शुरुआत की बात करें तो, कांग्रेस ने पहले वंदे मातरम् के केवल दो पंक्तियों के गायन का फैसला लिया है, जिसके बाद से राजनीतिक गलियारों में इस पर बहस तेज हो गई है।

हालांकि दूसरी ओर तेज होती सियासत को देखते हुए अब भाजपा ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है। भाजपा ने कांग्रेस कार्यसमिति के वंदे मातरम् के फैसले के खिलाफ 10 बिंदुओं का कड़ा निंदा प्रस्ताव पारित किया। इतना ही नहीं पार्टी ने पूरे देश में राजनीतिक प्रदर्शन और जनसंपर्क अभियान चलाने का एलान किया है।

ऐसे में इस वैचारिक तकरार के बीच अब सवाल है कि क्या राष्ट्रीय गीत के गायन के नियमों का उल्लंघन करने पर किसी कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है और है तो क्या-क्या सजा मिलेगी? आइए हम आपको बताते हैं।

अपमान पर 'जन गण मन' की तरह मिलेगी सजा
एक तरफ बढ़ता सियासी पारा और फिर संसद में पारित राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 के अस्तित्व में आने के बाद अब राष्ट्र गीत के अपमान या इसके गायन में बाधा डालने पर वही सजा मिलेगी जो अब तक राष्ट्र गान 'जन गण मन' के लिए तय था।

कांग्रेस के फैसले से कैसे तेज हुई सियासत?
बता दें कि यह विवाद सातवें आसमान पर तब पहुंचा, जब कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने अपने आधिकारिक कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के गायन को पूरे छह छंदों के बजाय केवल पहले दो पदों तक सीमित रखने का निर्णय लिया।

इस फैसले के सामने आने के बाद राजनीतिक संग्राम छिड़ गया। आलोचकों और सत्तापक्ष ने कांग्रेस कार्यालयों में अतीत और वर्तमान के आयोजनों के दौरान इस ऐतिहासिक गीत के गायन को सीमित करने या बीच में रोकने की घटनाओं को आड़े हाथों लिया।

अब भाजपा का 10 बिंदुओं वाला प्रस्ताव
दूसरी तरफ बढ़ते इस विवाद के बीच भाजपा ने आक्रामक रुख अपनाते हुए पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम की बैठक में वंदे मातरम् के सम्मान में 10 बिंदुओं वाला एक कड़ा प्रस्ताव पारित किया।

भाजपा ने कांग्रेस के इस निर्णय को खारिज करते हुए इसे 1937 के उस ऐतिहासिक कदम की पुनरावृत्ति करार दिया, जिसे लेकर पार्टी का मानना है कि यह देश के सांस्कृतिक विभाजन की वैचारिक नींव से जुड़ा था। सत्तारूढ़ दल ने साफ कर दिया है कि राष्ट्र गीत के सम्मान और उसकी ऐतिहासिक विरासत से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

वंदे मातरम् के उल्लंघन पर अब कैसी कानूनी कार्रवाई होगी?
अब बात वंदे मातरम् के अपमान और कानूनी सजा की करें तो, नए संशोधन के बाद, यद कोई व्यक्ति या समूह राष्ट्र गीत के गरिमापूर्ण आचरण के खिलाफ जाता है, तो कानून बेहद सख्त हो चुका है।

ऐसे में यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम्' के गायन को रोकता है, या इसके गायन में जुड़ा हुआ किसी सभा या समूह में व्यवधान पैदा करता है, तो इसे राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के तहत एक दंडनीय अपराध माना जाएगा।

तीन वर्ष तक के कठोर कारावास की मिलेगी सजा
इस अपराध के लिए दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को तीन वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों की सजा भुगतनी पड़ सकती है। बड़ी बात यह है कि इसके अलावा यदि कोई् व्यक्ति इस अपराध को दोबारा या इसके बाद फिर दोहराता है, तो कानून की धारा 3क के तहत उस पर नरमी नहीं बरती जाएगी। ऐसे दोषियों के लिए कम-से-कम एक वर्ष के अनिवार्य कठोर कारावास का प्रावधान लागू किया गया है।

राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 क्या है?
देश के राष्ट्रीय प्रतीकों और सम्मान की रक्षा के लिए आज से करीब 55 साल पहले, यानी 23 दिसंबर 1971 को एक विशेष कानून बनाया गया था। यह कानून पूरे देश में सख्ती से लागू होता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य देश के उन प्रतीकों को कानूनी सुरक्षा देना है, जो हमारी राष्ट्रीय पहचान और एकता का प्रतीक हैं। इसके दायरे में मुख्य रूप से भारत का राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा), भारत का संविधान और भारत का राष्ट्रगान ('जन गण मन') आता है।
इस कानून के तहत अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से इन राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करता है, जलाता है, फाड़ता है या इनके गायन/सम्मान में बाधा डालता है, तो उसे एक गंभीर अपराध माना जाता है और इसके लिए जेल या जुर्माने की सजा का प्रावधान है।
अब एक राष्ट्र, एक स्वर और कानूनी मर्यादा का आधार भी समझिए

इस कानून के तहत अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से इन राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करता है, जलाता है, फाड़ता है या इनके गायन/सम्मान में बाधा डालता है, तो उसे एक गंभीर अपराध माना जाता है और इसके लिए जेल या जुर्माने की सजा का प्रावधान है।

अब एक राष्ट्र, एक स्वर और कानूनी मर्यादा का आधार भी समझिए
गौरतलब है कि संविधान सभा की 24 जनवरी, 1950 की ऐतिहासिक बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने रेखांकित किया था कि स्वतंत्रता संग्राम में जिस गीत ने प्राण फूंके थे, उसे 'जन गण मन' के समान ही बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। फिर, समय के पहिए ने करवट ली और 2026 के इस संशोधन ने उस वैधानिक कमी को पूरी तरह पाटने का काम किया है।

ऐसे में इस बात को समझिए कि एक तरफ जहां राजनीतिक दल अपने-अपने इतिहास और वैचारिक दृष्टिकोण के साथ वंदे मातरम् के स्वरूप को लेकर आमने-सामने हैं, वहीं दूसरी तरफ यह संशोधन यह स्पष्ट संदेश देता है कि राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता और प्रतीकों का अनादर अब कानून की नजरों में अक्षम्य अपराध है।

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