एविएशन सेक्टर में नए समीकरण के संकेत, ‘अडानी एयरलाइंस’ की चर्चा ने बढ़ाई हलचल

मुंबई 

आने वाले समय में अडानी ग्रुप एविएशन सेक्टर में भी कदम रख सकता है। इसके लिए अडानी समूह उस नियम में बदलाव चाहता है जो एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइन में हिस्सेदारी रखने से रोकता है। इस बदलाव से ग्रुप अपनी एयरलाइन सर्विस शुरू कर सकेगा। सरकार मौजूदा एयरपोर्ट प्राइवेटाइजेशन एग्रीमेंट में बदलाव के लिए कानूनी जानकारों से सलाह ले रही है। यानी अगर सबकुछ ठीक रहा तो आसमान में ‘अडानी एयरलाइंस’ के विमान भी उड़ते नजर आएंगे।

बता दें अडानी ग्रुप पहले से ही भारत के सबसे बड़े प्राइवेट पोर्ट ऑपरेटर, दूसरे सबसे बड़े सीमेंट उत्पादक, और ऊर्जा क्षेत्र (बिजली, गैस, सोलर) में बड़ा खिलाड़ी है। अब अगर वह एयरलाइन क्षेत्र में भी प्रवेश करता है, तो उसका प्रभाव और भी बढ़ जाएगा, जिससे बाजार में उसकी बढ़ती ताकत को लेकर चिंताएं पहले से मौजूद हैं।

मोदी सरकार बना रही योजना
ब्लूमबर्ग के मुताबिक भारत सरकार एक ऐसी नीति पर चर्चा कर रही है, जिसके तहत एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनियों को खुद की एयरलाइन शुरू करने की इजाजत दी जा सकती है। इस कदम से अडानी ग्रुप और जीएमआर एयरपोर्ट्स जैसी बड़ी कंपनियों को अपने खुद के एयरलाइंस शुरू करने का रास्ता मिल सकता है।

सरकार का मुख्य उद्देश्य देश के घरेलू हवाई अड्डे पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाना है, क्योंकि फिलहाल इंडिगो और एयर इंडिया मिलकर करीब 90 फीसदी बाजार पर कब्जा किए हुए हैं।

मौजूदा नियम: दिल्ली-मुंबई पर विशेष पाबंदी
अभी नियमों के अनुसार, दिल्ली और मुंबई के एयरपोर्ट ऑपरेटर किसी भी एयरलाइन में 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी नहीं रख सकते। यह पाबंदी खास तौर पर इन दो प्रमुख हवाई अड्डों के लिए है। अगर इस नियम में ढील दी जाती है, तो अडानी समूह (जो मुंबई एयरपोर्ट सहित कुल आठ एयरपोर्ट संचालित करता है) और जीएमआर (जो दिल्ली एयरपोर्ट के अलावा चार अन्य एयरपोर्ट चलाता है) अपनी खुद की एयरलाइनें शुरू कर सकते हैं।

एकाधिकार तोड़ने की कोशिश
इस नीति के पीछे सरकार की मंशा घरेलू विमानन बाजार में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना है। फिलहाल इंडिगो और एयर इंडिया का दबदबा इतना ज्यादा है कि यह लगभग दो-कंपनियों का एकाधिकार बन गया है। नए खिलाड़ियों के आने से यात्रियों को ज्यादा विकल्प मिल सकते हैं और कीमतों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

हालांकि, इससे यह चिंता भी पैदा होती है कि एयरपोर्ट ऑपरेटर अपनी खुद की एयरलाइन को प्रमुख स्लॉट यानी फ्लाइट का टाइम और पार्किंग अलॉट करने में पक्षपात कर सकते हैं, जिससे बाजार में नया असंतुलन पैदा होगा।

कई मंजूरियां जरूरी
यह फैसला अभी नागरिक उड्डयन मंत्रालय के भीतर विचाराधीन है। अगर कोई छूट या नियम में बदलाव होता है, तो इसके लिए कानून मंत्रालय से कानूनी मंजूरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति भी लेनी होगी। यानी यह कोई फौरी फैसला नहीं है, बल्कि इस पर व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श चल रहा है।

एविएशन एक्सपर्ट्स के अनुसार, भले ही नए एयरलाइन ऑपरेटरों को इजाजत मिल जाए, लेकिन कम से कम अगले कुछ वर्षों में इसका बाजार पर बड़ा असर नहीं दिखेगा। कारण यह है कि दुनिया भर में विमानों की कमी है।

बोइंग और एयरबस दोनों को डिलीवरी में देरी हो रही है और कोविड-काल की सप्लाई चेन समस्याएं अब भी जारी हैं। नई एयरलाइन को विमान मिलने में काफी समय लग सकता है। कैपा इंडिया के प्रमुख कपिल कौल के अनुसार, यह नीति एक बड़ी सोच का संकेत है, लेकिन नई एयरलाइन को बाजार में असर डालने में लंबा समय लगेगा।

बता दें दुनिया के दूसरे देशों में एयरपोर्ट और एयरलाइन के संयुक्त स्वामित्व को ज्यादा सफलता नहीं मिली है। अमेरिका में कानून एयरपोर्ट की कमाई को एयरलाइन में निवेश करने से रोकते हैं। यूरोपीय संघ में इसे तकनीकी रूप से अनुमति है, लेकिन वहां की एकाधिकार-विरोधी कानून इसे व्यावहारिक रूप से मुश्किल बना देते हैं। भारत इस मामले में नए रास्ते पर चल सकता है, लेकिन उसे अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से सबक लेने की भी जरूरत है।

पिछले दशक में घटी एयरलाइनों की संख्या
पिछले दस सालों में भारतीय एयरलाइनों की संख्या में भारी कमी आई है। जेट एयरवेज, गो एयर जैसी कंपनियां बंद हो गईं, विस्तारा और एयरएशिया इंडिया का टाटा समूह में विलय हो गया। अब बाजार में इंडिगो और एयर इंडिया ही सबसे बड़ी ताकत हैं, जबकि अकासा एयर, स्पाइसजेट और कुछ छोटी क्षेत्रीय एयरलाइनें किनारे पर हैं। यह स्थिति पिछले साल दिसंबर में इंडिगो के संकट के दौरान साफ नजर आई, जब पायलटों की कमी के कारण हजारों उड़ानें रद्द हो गईं और रेलवे को अतिरिक्त ट्रेनें चलानी पड़ीं।

एयरपोर्ट की संख्या दोगुनी होगी
भारत साल 2047 तक एयरपोर्ट की संख्या दोगुनी करके 350 करने की योजना बना रहा है। अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन संघ (IATA) के अनुसार, 2044 तक भारत में 425 मिलियन अतिरिक्त यात्री जुड़ जाएंगे, जो 2024 के स्तर से लगभग तीन गुना ज्यादा है। इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों को संभालने के लिए अधिक एयरलाइनों की जरूरत होगी, और यह नीति उसी दिशा में एक कदम हो सकती है।

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