2029 महिला आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव, नए संविधान संशोधन से बढ़ेगा राजनीतिक टकराव

नई दिल्ली
केंद्र की भाजपा नीत एनडीए सरकार आगामी मॉनसून सत्र में महिला आरक्षण को 2029 से ही लागू करने के लिए एक नया संविधान संशोधन विधेयक और लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने के लिए परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) लाने की तैयारी में है। हालांकि, इन ऐतिहासिक विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाने की होगी। संसद के पिछले बजट सत्र में संख्या बल की कमी के कारण 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिर गया था, जिसके बाद साधारण बहुमत से पास होने वाले परिसीमन विधेयक को आगे नहीं बढ़ाया गया था। इस बार सरकार नए सिरे से रणनीति बना रही है।

दो-तिहाई बहुमत से कितनी दूर है NDA?
संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन अनिवार्य है। मौजूदा स्थिति में पाला बदलने वाले सांसदों को जोड़ने के बाद भी एनडीए बहुमत के आंकड़े से पीछे है। लोकसभा में एनडीए की वर्तमान ताकत 319 सांसदों की हो चुकी हैं। इनमें टीएमसी 20 और शिवसेना यूबीटी के 6 सांसद भी शामिल हैं। अब भाजपा को संसद में 41 सीटों की आवश्यक्ता है। आपको बता दें कि 543 सीटों वाले लोकसभा में दो तिहाई बहुत में के लिए 360 सांसदों की जरूरत होती है।

राज्यसभा का क्या है समीकरण
राज्यसभा में NDA की वर्तमान ताकत 152 सांसदों की है। दो-तिहाई बहुमत के लिए 161 सांसदों की जरूरत है। भाजपा को यहां भी 9 सांसदों के समर्थन की आवश्यक्ता है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को या तो विपक्षी दलों का सीधा समर्थन चाहिए होगा या फिर मतदान के समय वॉकआउट के जरिए दो-तिहाई के लिए जरूरी कुल संख्या को कम करना होगा।

तमिलनाडु का बदलता समीकरण
विपक्षी और क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करने के लिए नए विधेयक में उनकी चिंताओं को दूर करना सबसे अहम होगा। 22 लोकसभा सांसदों वाली द्रमुक (DMK) का रुख हमेशा से सीटों के आवंटन पर मौजूदा स्थिति बनाए रखने का रहा है। डीएमके का मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों की सीटें कम नहीं होनी चाहिए। तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद सी. जोसेफ विजय की पार्टी TVK के सत्ता में आने से राज्य के राजनीतिक समीकरण बदले हैं, जिससे भाजपा के प्रति डीएमके के कड़े रुख में कुछ नरमी के संकेत मिले हैं। हालांकि डीएमके सांसद तिरुची शिवा का कहना है कि आधिकारिक प्रस्ताव सामने आने से पहले कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

क्या हैं संवैधानिक अड़चनें?
इस पूरे विवाद और नए विधेयक के केंद्र में अनुच्छेद 81 के दो मुख्य कड़े नियम हैं। अंतर-राज्यीय सीटों का आवंटन यानी कि अनुच्छेद 81(2)(a)। यह नियम कहता है कि राज्यों को लोकसभा सीटें उनकी आबादी के अनुपात में मिलनी चाहिए। आपको बता दें कि देश में राज्यों के बीच सीटों के संतुलन को बनाए रखने के लिए 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों के आवंटन को पिछले 50 वर्षों से फ्रीज किया गया है। पहला फ्रीज 1976 में और दूसरा 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान लगाया गया था। इसकी मियाद 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े आने पर समाप्त हो जाएगी।

2011 की जनगणना का पेंच
यदि सरकार 2011 की जनगणना को आधार बनाकर नया परिसीमन लाती है तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सीटें दक्षिण भारत के केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी, क्योंकि उत्तर भारत की आबादी तेजी से बढ़ी है। केंद्र सरकार अन्य दलों का समर्थन हासिल करने के लिए अनुच्छेद 81 में संशोधन करके इस फ्रीज की समयसीमा को कुछ और दशकों के लिए आगे बढ़ा सकती है, जिससे राज्यों की मौजूदा सीटों का अनुपात सुरक्षित रहे।

राज्य के भीतर का परिसीमन
यह नियम राज्य के भीतर ही अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करता है ताकि राज्य के भीतर सभी क्षेत्रों में जनसंख्या का अनुपात बराबर रहे। वर्तमान में इसके लिए 2001 की जनगणना को आधार माना गया है। सरकार नए विधेयक में इसे बदलकर 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित करने का प्रस्ताव दे सकती है, जिस पर विपक्षी दलों में व्यापक सहमति बनने की संभावना अधिक है।

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