ईरान संकट में भारत की ओर रुख कर रहे पड़ोसी, अरबों का वादा करने वाला चीन क्यों नहीं आ रहा सामने?

नई दिल्ली

जब मुसीबत आती है, तो पता चलता है कि असली दोस्त कौन है. ईरान युद्ध के कारण जब दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई ठप होने लगी है, तो भारत के पड़ोसी देश चीन के अरबों रुपये के कर्ज को भूलकर अब नई दिल्ली की तरफ दौड़ रहे हैं. चीन भले ही पैसे बांटता हो, लेकिन जब किचन का चूल्हा जलाने और गाड़ियां चलाने के लिए तेल की जरूरत पड़ी, तो सबको सिर्फ भारत से ही आस है। 

ईरान संघर्ष की वजह से स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद है. ऐसे में नेपाल से लेकर श्रीलंका और मालदीव तक, सबके सामने अंधेरा छाने लगा है. न उन्‍हें तेल मिल पा रहा है और ना ही गैस. इन देशों को अब समझ आ गया है कि मुश्किल वक्त में भारत ही वह भरोसेमंद पार्टनर है जो उन्हें डूबने से बचा सकता है। 

देश-दर-देश: किसने मांगी कितनी मदद?

श्रीलंका: मोदी से बात की और मिल गया तेल
श्रीलंका में हालात इतने खराब हैं कि स्कूल बंद करने पड़ रहे हैं. राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने खुद बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से बात की और तुरंत मदद मिल गई. भारत ने मार्च में 38,000 मीट्रिक टन डीजल और पेट्रोल श्रीलंका भेजा है. श्रीलंका ने इसके लिए भारत का दिल से आभार जताया है। 

नेपाल: चूल्हा जलाने के लिए भारत पर निर्भर
नेपाल में गैस की भारी किल्लत हो गई है. वहां लोग अब आधे सिलेंडर से काम चला रहे हैं. नेपाल ने भारत से मांग की है कि उसे हर महीने मिलने वाली 48,000 टन गैस के अलावा 3,000 टन और गैस दी जाए. नेपाल को पता है कि उसकी रसोई तभी जलेगी जब भारत से ट्रक रवाना होंगे। 

बांग्लादेश: पाइपलाइन से पहुंची मदद
बांग्लादेश भी डीजल के लिए भारत के आगे हाथ फैला रहा है. भारत पहले से ही उसे सालाना 1.8 लाख टन तेल देता है, लेकिन युद्ध के चलते सप्लाई कम हुई तो भारत ने पाइपलाइन के जरिए तुरंत हजारों टन डीजल और भेज दिया। 

मालदीव: पुरानी कड़वाहट भूल मांगी मदद
हाल के दिनों में रिश्तों में उतार-चढ़ाव के बावजूद, मालदीव को जब अपनी ऊर्जा सुरक्षा की चिंता हुई तो वह भी भारत के पास ही आया है. मालदीव ने कम समय और लंबे समय, दोनों के लिए तेल सप्लाई की गुहार लगाई है, जिस पर भारत विचार कर रहा है। 

मॉरीशस और सेशेल्स
इन देशों से भी लगातार बातचीत जारी है. जैसे-जैसे ऊर्जा संकट बढ़ रहा है, ये देश भी भारत के साथ खड़े होने की तैयारी में हैं। 

एक्सपर्ट्स बोले- चीन नहीं, भारत है असली लीडर
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कर्ज का जाल बिछाता है, लेकिन जीवन की बुनियादी जरूरतों जैसे तेल, गैस, बिजली के लिए भारत की क्षमता और नियत दोनों साफ हैं. एशिया ग्रुप के अशोक मलिक के मुताबिक, इस मदद से भारत की साख पूरी दुनिया में बढ़ेगी। 

भारत की अपनी चुनौतियां
भले ही भारत सबको मदद दे रहा है, लेकिन वह खुद भी मुश्किलों से लड़ रहा है. भारत के 18 जहाज अब भी युद्ध क्षेत्र में फंसे हुए हैं जिन्हें निकालने की कोशिश जारी है. इसके बावजूद, भारत अपनी जरूरतें पूरी करते हुए पड़ोसियों का साथ छोड़ नहीं रहा है। 

भारत एकतरफा नहीं
सबसे बड़ी बात, भारत एकतरफा नहीं है. न तो वह पूरी तरह अमेर‍िका-इजरायल के साथ खड़ा दिखता है और ना ही ईरान के साथ. इसल‍िए पड़ोसी देशों को लगता है क‍ि भारत हर देश के साथ बात कर सकता है. हर देश के साथ जरूरत पड़ने पर हमारी मदद कर सकता है. यही भारत के लीडर बनने की कहानी है। 

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