बिल फेल होने पर नरेंद्र मोदी का बड़ा बयान—‘इसकी कीमत चुकानी होगी’

नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को लोकसभा में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक के गिर जाने पर गहरी नाराजगी और निराशा व्यक्त की है। महिला आरक्षण से जुड़े इस महत्वपूर्ण बिल का समर्थन न करने को लेकर पीएम मोदी ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों को अपने इस फैसले के लिए 'जिंदगी भर पछताना पड़ेगा।'

संसद भवन में CCS की बैठक के दौरान की टिप्पणी
खबर के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी ने ये टिप्पणियां दिल्ली स्थित संसद भवन में आयोजित सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की बैठक के दौरान कीं। बैठक में प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि विपक्षी दलों को इस बिल को समर्थन न देने की भारी 'कीमत चुकानी होगी।' उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि वे अब अपने इस कदम का बचाव करने और इस पर पर्दा डालने के लिए तरह-तरह के बहाने ढूंढ रहे हैं।

हर गांव तक संदेश पहुंचाने का आह्वान
प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को सीधे जनता के बीच ले जाने पर जोर दिया है। पीएम ने कहा: उन्हें (विपक्ष को) इसकी कीमत चुकानी होगी। हमें देश के हर गांव तक यह बात पहुंचानी होगी कि विपक्ष की मानसिकता पूरी तरह से महिला विरोधी है। वे पहले से ही अपनी इस गलती को छिपाने के लिए कारण ढूंढने में लगे हुए हैं।

कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर आक्रामक रुख अपनाएगी और विपक्ष के इस कदम को पूरे देश में 'महिला विरोधी' कृत्य के तौर पर पेश करेगी।

131वां संविधान संशोधन बिल क्या था?
केंद्र सरकार द्वारा 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पेश किए गए 131वें संविधान संशोधन बिल के मुख्य रूप से तीन बड़े और दूरगामी उद्देश्य थे।

लोकसभा सीटों का विस्तार: इस बिल के तहत लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या को 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था। इसमें राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35 सदस्यों के चुने जाने की व्यवस्था थी।

समय से पहले परिसीमन: संविधान के अनुच्छेद 82 में संशोधन करके परिसीमन प्रक्रिया में बदलाव लाना। मौजूदा नियम के मुताबिक अगला परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर होना था। लेकिन यह बिल उस रोक को हटाकर 2011 की जनगणना के आधार पर ही तुरंत नया परिसीमन लागू करने का रास्ता साफ कर रहा था।

महिला आरक्षण का तत्काल क्रियान्वयन: 2023 में पास हुए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान है। सरकार इसको इसी नए परिसीमन के लागू होते ही धरातल पर उतारना चाहती थी।

यह बिल कैसे गिर गया?
17 अप्रैल को लोकसभा में दो दिनों की लंबी बहस के बाद जब इस बिल पर वोटिंग हुई, तो यह तकनीकी और राजनीतिक कारणों से जरूरी आंकड़ा नहीं जुटा सका।

संविधान संशोधन की शर्त: किसी भी संविधान संशोधन बिल को पास करने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले कुल सदस्यों के दो-तिहाई (2/3rd) बहुमत की आवश्यकता होती है।

वोटिंग के आंकड़े: वोटिंग के दौरान लोकसभा में कुल 528 सांसद उपस्थित थे। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में 230 वोट डाले गए। दो-तिहाई बहुमत (लगभग 352 वोट) का अनिवार्य जादुई आंकड़ा न छू पाने के कारण यह ऐतिहासिक बिल 54 वोटों की कमी से गिर गया। इस प्रमुख बिल के गिरने के ठीक बाद, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने घोषणा की कि सरकार परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े अन्य दो संबंधित बिलों पर भी अब आगे नहीं बढ़ेगी।

विपक्ष ने क्यों किया इसका कड़ा विरोध?
विपक्षी दलों ने स्पष्ट किया कि वे महिला आरक्षण का समर्थन करते हैं, लेकिन उनका असली विरोध बिल में शामिल 'परिसीमन' के पेंच को लेकर था।

दक्षिण भारतीय राज्यों को नुकसान की आशंका: विपक्ष का सबसे बड़ा तर्क यह था कि अगर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ, तो दक्षिण भारतीय राज्यों को भारी नुकसान होगा। इन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में बेहतरीन काम किया है, इसलिए नए परिसीमन से लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व घट जाएगा और उत्तर भारतीय राज्यों का दबदबा बढ़ जाएगा।

सियासी फायदे का आरोप: विपक्षी धड़े ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह 'महिला आरक्षण' जैसे संवेदनशील मुद्दे की आड़ में जल्दबाजी में परिसीमन थोपना चाहती है, ताकि देश के चुनावी नक्शे को बदलकर राजनीतिक लाभ लिया जा सके।

विपक्ष के इसी एकजुट विरोध के कारण सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने में विफल रही और 2014 के बाद पहली बार मोदी सरकार को संसद में किसी इतने बड़े विधायी प्रस्ताव पर हार का सामना करना पड़ा।

 

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