अरावली की चोटियों पर कंक्रीट का कब्जा, रिसर्च में सामने आई बिल्डरों की मनमानी

उदयपुर
अरावली पहाड़ियों के संरक्षण का जायजा लेने और स्थानीय लोगों से बातचीत करने के लिए 9 व 10 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की विशेष समिति उदयपुर के दौरे पर आ रही है। इस अहम दौरे से ठीक पहले एक वैज्ञानिक शोध ने झीलों की नगरी में अरावली की चोटियों पर चल रहे कंक्रीट के अवैध निर्माणों की पोल खोल दी है। सैटेलाइट इमेजरी आधारित इस अध्ययन ने साबित किया कि यूडीए क्षेत्र के नो-कंस्ट्रक्शन जोन यानी अरावली की चोटियों और संवेदनशील ढलानों पर धड़ल्ले से सैकड़ों निजी होटल, रिसॉर्ट और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स खड़े कर दिए गए हैं।

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय की डॉ. सीमा जालान और इसरो (एनआरएससी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक दंडबाथुला गिरिबाबू के इस शोध ने न केवल बिल्डर्स और प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे नीतिगत खामियों का फायदा उठाकर झीलों को कैचमेंट देने वाली पहाड़ियों का क्षरण किया गया। राजस्थान हाईकोर्ट के कड़े रुख और सुप्रीम कोर्ट समिति के आगमन के बीच यह रिपोर्ट प्रशासन के लिए आईना साबित हो रही है।

पर्यटन और आबादी के दबाव ने ली पहाड़ियों की बलि
साल 2010 में उदयपुर में पर्यटकों की संख्या लगभग 7.5 लाख थी, जो 2024 में उछलकर 18.5 लाख तक पहुंच गई। शहर में अब पर्यटकों के लिए करीब 850 संपत्तियां मौजूद हैं, जिनमें 30 फाइव स्टार होटल और 80 रिसॉर्ट शामिल हैं। दूसरी ओर, यूडीए का क्षेत्रफल जो 1999-2012 तक 350.9 वर्ग किमी था, वह 30% बढ़कर 2024 में 457 वर्ग किमी हो गया है। आबादी भी 4.7 लाख से बढ़कर 7 लाख तक पहुंच गई। इसी दबाव की आड़ में पहाड़ियों पर अतिक्रमण हुआ।

साल 1972 से 2024: ऐसे बदला अरावली का भूगोल
शोधकर्ताओं ने साल 1972 के 'कोरोना सैटेलाइट' के ऐतिहासिक डेटा की तुलना 2024 की आधुनिक सैटेलाइट तस्वीरों से की, जिसके निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले हैं। अरावली की पहाड़ियों का सबसे तेज और विनाशकारी क्षरण साल 2014 के बाद हुआ है। कुल संवेदनशील निर्माणों में से 50 प्रतिशत का निर्माण साल 2017 के बाद हुआ। साल 2023-24 के दौरान पहाड़ियों पर 40 बड़े नए प्रोजेक्ट्स खड़े हो गए।

160 में से 144 निर्माण निजी
रिसर्च के दौरान यूडीए क्षेत्र की पहाड़ियों और तलहटी में 160 निर्माणों का अध्ययन किया गया। सरकारी और ऐतिहासिक धरोहर को हटा दें तो इनमें से 144 विशुद्ध रूप से निजी निर्माण हैं।

    होटल और रिसॉर्ट्स: 64 (लगभग 50%)
    शैक्षणिक संस्थान / फार्म हाउस / रिहायशीः 33
    कमर्शियल/इंडस्ट्रियल इकाइयां: 10%

30 डिग्री ढलान तक पहुंचे निर्माण
    पहाड़ियों पर निर्माण के लिए ढलान और ऊंचाई के सख्त नियम हैं, लेकिन यहां सब दरकिनार हैं।
    37 बड़े व्यावसायिक/निजी प्रतिष्ठान और फार्महाउस ऐसी ढलानों पर हैं, जो 11.33 डिग्री से अधिक तीखे हैं और 600 मीटर से अधिक ऊंचाई पर हैं।
    कई होटल और रिसॉर्ट 20 डिग्री से अधिक की तीव्र ढलान और 700 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर बना दिए गए हैं।
    हालात ऐसे हैं कि 30 डिग्री से अधिक ढलान वाली अत्यंत संवेदनशील पहाड़ियों पर भी अवैध निर्माण जारी है।

इसरो का अचूक समाधान: एक क्लिक में खत्म होगा बिल्डर्स का खेल
नासा के लेजर सैटेलाइट डेटा का उपयोग करके वैज्ञानिकों ने खुले तौर पर उपलब्ध डिजिटल एलिवेशन मॉडल्स का परीक्षण किया। इसके अध्ययन में एसआरटीएम जिसका एरर 9.54 मीटर है और एलोस पलसार जिसका एरर 10.78 मीटर की कमियों को उजागर किया। इन्हीं का इस्तेमाल प्रशासन ने किया, जिसकी वजह से गलत जगहों पर भी निर्माण हुआ। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए फेबडेम तकनीक सबसे सटीक है, जिसका एरर मात्र 7.72 मीटर है। यह तकनीक पेड़ों और इमारतों को हटाकर जमीन की सटीक ऊंचाई दिखाती है।

यदि प्रशासन इस तकनीक से तैयार थ्री डी मैप पर अपने राजस्व (खसरा) मैप की लेयर चढ़ा दे, तो एक क्लिक में पता चल सकता था कि किस खसरा नंबर पर निर्माण की अनुमति दी जा सकती है और कौन सा हिस्सा पूरी तरह नो-कंस्ट्रक्शन जोन में आता है।

मनभावन नजारों की कीमत चुका रहे पहाड़
सबसे ज्यादा 60% (86 निर्माण) उदयपुर की झीलों के पश्चिम, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में केंद्रित हैं। नाई, बूझड़ा, गोरैला और सज्जनगढ़ की पहाड़ियों पर झीलों और जंगलों के सुरम्य दृश्यों को भुनाने के लिए आतिथ्य उद्योग ने नियमों को ताक पर रख दिया।

सड़क के केंद्र से ढलान मापने का खेल
बिल्डर्स को ये अनुमतियां कैसे मिली, जवाब है नीतिगत खामी। प्रदेश सरकार के कंजरवेशन ऑफ हिल इन अर्बन एरियाज रेगुलेशन 2018 और 2024-25 के नए ड्राफ्ट में ढलान नापने का आधार सबसे पास के कनेक्टिंग रोड का सेंटरलाइन तय किया था। इससे बेसलाइन बढ़ जाती है, जिससे पहाड़ का ढलान कागजों में कम दिखता है। इसी अस्पष्टता का फायदा उठाकर बिल्डर्स ने धड़ाधड़ अनुमतियां लीं और प्रशासन ने इसकी प्रमाणिकता जांची ही नहीं।

राजस्थान हाईकोर्ट का कड़ा रुख
राजस्थान उच्च न्यायालय (जोधपुर पीठ) ने 9 मई 2024 को झील संरक्षण समिति बनाम राजस्थान सरकार मामले में आदेश दिया था कि पहाड़ियों के सटीक सीमांकन के लिए तकनीक आधारित विकल्पों का उपयोग किया जाए। सुप्रीम कोर्ट कमेटी भी इसी तकनीकी सुदृढ़ता की पड़ताल करेगी।

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