सिंधु जल विवाद में भारत का मजबूत तर्क, अमेरिका, रूस और चीन की मिसाल देकर पाकिस्तान को घेरा

नई दिल्ली
सिंधु जल समझौते पर पाकिस्तान बिलबिला रहा है. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस समझौते को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है. अब पाकिस्तान गीदड भभकियां दे रहा है, और सीधे तौर पर हिंसा का सहारा लेने की बात कर रहा है. लेकिन बड़बोले पाकिस्तान को ये पता नहीं है कि भारत के पास अमेरिका, रूस और चीन द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक तर्क है. इसी तर्क का सहारा लेकर ये तीनों बड़े देश अंतर्राष्ट्रीय समझौते से बाहर निकल गए और अपनी राष्ट्रीय चिंताओं और हित को ज्यादा तवज्जो दी। 

अभी हाल ही में पाकिस्तान के मंत्री ने अताउल्लाह तरार ने एक सेमिनार में कहा है कि भारत इंडस वॉटर ट्रीटी (IWT) यानी सिंधु जल समझौते को संशोधित, रद्द या निलंबित नहीं कर सकता है. लेकिन पाकिस्तान ने भारत की चिंता आतंकवाद पर मुंह सिल लिया है। 

हालांकि भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़े देशों द्वारा किए गए समझौतों के उल्लंघन के उदाहरण देकर भारत के वैध अधिकार पर जोर दिया है और कहा है कि भारत को आतंकवाद को लेकर अपनी चिंता दूर करने के लिए हर कदम उठाने का अधिकार है। 

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर (रिटायर्ड) ने एक्स पर ट्वीट कर कहा कि अगर अमेरिका JCPOA से हट सकता है, रूस INF ट्रीटी से दूर जा सकता है और चीन दक्षिण चीन सागर पर हेग के फैसले को खारिज कर सकता है, तो भारत भी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में IWT को अस्थायी रूप से निलंबित कर सकता है। 

कहने का अर्थ है कि दुनिया की बड़ी ताकतों ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों को तब नज़रअंदाज़ किया या उनसे बाहर निकल गए, जब वे उनके राष्ट्रीय हितों के काम के नहीं रहे. रक्षा विशेषज्ञ पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर (रि) का कहना है कि ताकतवर देश संधियों का सख्ती से पालन करने के बजाय रणनीतिक/राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों को ज़्यादा अहमियत देते हैं, इसलिए भारत भी IWT के मामले में ऐसा कर सकता है। 

सिंधु जल समझौता 1960 में भारत और Pakistan के बीच हुआ एक ऐतिहासिक जल-बंटवारा समझौता है, जिसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी. इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया. रावी, ब्यास और सतलुज का अधिकांश जल भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चेनाब का मुख्य उपयोग पाकिस्तान को दिया गया। 

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भारत लंबे समय से इस समझौते की समीक्षा की मांग कर रहा है। 

आइए समझते हैं कि दुनिया की बड़ी ताकतें कब अपने राष्ट्रीय हित में अंतर्राष्ट्रीय समझौते से बाहर निकल गईं। 

ईरान डील (JCPOA) से 2018 में अलग हुआ अमेरिका 
क्या हुआ: राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका 2015 के 'जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन' (JCPOA) से 2018 में एकतरफ़ा तौर पर खुद को अलग कर लिया और दूसरे हस्ताक्षरकर्ताओं (UK, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन, EU) के विरोध के बावजूद फिर से ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए। 

अमेरिका क्या तर्क दिए: अमेरिका का तर्क था कि यह डील बुनियादी तौर पर खराब थी. ट्रंप ने इसे अबतक का सबसे खराब डील कहा. अमेरिका का कहना है कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी गतिविधियों और "सनसेट क्लॉज़" (समय-सीमा वाली शर्तें) जैसे मुद्दों को ठीक से नहीं सुलझाया गया था, जिनकी वजह से ईरान को आगे चलकर एडवांस्ड न्यूक्लियर काम फिर से शुरू करने की इजाज़त मिल जाती. ट्रंप इसे एक बुरा सौदा मानते थे जिससे ईरान तो मजबूत हुआ, लेकिन उसके न्यूक्लियर इरादों या अमेरिका के सहयोगियों पर कोई खास रोक नहीं लगी. इसे एक राजनीतिक प्रतिबद्धता माना गया जिसका लागू होना अमेरिका की इच्छाशक्ति पर निर्भर था. मौका देखकर अमेरिका इस डील से बाहर निकल गया. 2025-2026 में इसी मुद्दे को लेकर भयंकर युद्ध हुआ है। 

INF (Intermediate-Range Nuclear Forces) से बाहर निकला रूस 
क्या हुआ:
अमेरिका ही नहीं दुनिया के दूसरे देश भी अंतरराष्ट्रीय संधियों का अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करते रहे हैं. 1987 में अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच एक समझौता हुआ. यह एक परमाणु नियंत्रण समझौता था, इसमें 500 से 5500 किलोमीटर रेंज वाली जमीन से लॉन्च होने वाली मिसाइलों को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया था. यह शीत युद्ध को कम करने वाला ऐतिहासिक समझौता था। 

इसके बावजूद दोनों देश अपने मिशन पर गुप्त रूप से लगे रहे. अमेरिका ने 2019 में अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछ हट गया. फिर रूस ने भी ऐसा ही किया. इसके बाद'इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस ट्रीटी' खत्म हो गई। 

दोनों देशों ने क्या तर्क दिए: अमेरिका ने रूस पर संधि का गंभीर उल्लंघन करने का आरोप लगाया और कहा कि रूस प्रतिबंधित 9M729/SSC-8 मिसाइल बना रहा है। 

रूस ने तर्क दिया कि अमेरिका/नाटो की गतिविधियों (जैसे यूरोप में मिसाइल डिफेंस सिस्टम) और सुरक्षा के बदलते माहौल के कारण यह संधि अब पुरानी हो चुकी है. चीन द्वारा बिना किसी रोक-टोक के इंटरमीडिएट-रेंज मिसाइलें बनाई जा रही हैं. इसलिए अब इस संधि का कोई मतलब नहीं है. यानी कि इस संधि को लेकर किसी देश की प्रतिबद्धता नहीं थी। 

दोनों पक्षों ने संधि का पालन करना बंद कर दिया, जिससे यह संधि खत्म हो गई। 

UN संधि के फैसले को चीन ने ठुकराया
क्या हुआ दुनिया की एक और महाशक्ति चीन भी अपनी सुविधा के अनुसार ही संधियों का पालन किया. फ़िलीपींस की ओर से लाए गए एक मामले में  UNCLOS ने चीन के खिलाफ फैसला सुनाया और दक्षिण चीन सागर में चीन की ओर से कृत्रिम द्वीप बनाने को गलत करार दिया. चीन ने इस फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया. UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) संयुक्त राष्ट्र का समुद्री कानून पर अंतरराष्ट्रीय संधि है। 

चीन ने क्या तर्क दिया: चीन ने कभी भी ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया. उसका तर्क था कि इस विवाद में संप्रभुता का मामला शामिल है, जिस पर ट्रिब्यूनल कोई फैसला नहीं दे सकता है. और द्विपक्षीय बातचीत ही सही रास्ता है. उसने इस फैसले को गैर-कानूनी और राजनीतिक मकसद से प्रेरित माना और कहा कि यह उसकी "निर्विवाद" क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों पर बाध्यकारी नहीं है. इसके बावजूद चीन ने अपनी गतिविधियां जारी रखीं। 

ये उदाहरण दिखाते हैं कि बड़े देश राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा खतरों या दूसरे पक्ष के उल्लंघन के आधार पर अंतरराष्ट्रीय समझौतों से हट सकते हैं. IWT के मामले में भारत पाकिस्तान के आतंकवाद को पूरजोर तरीके से उठा सकता है. पाकिस्तान विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय अदालत का रुख कर सकता है. लेकिन वास्तविकता यह है कि शक्ति संतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा अक्सर कानूनी मान्यताओं और बाध्यताओं से ऊपर होती है। 

 

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