LNG संकट से निपटने की चीन की मेगा प्लानिंग, विशाल समुद्री परियोजना से दुनिया हैरान

बीजिंग 

होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया भर में तेल-गैस की किल्लत को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान की जंग ने दुनिया के कई देशों को आर्थिक मंदी के मुहाने पर ला खड़ा किया है. डर यह जताया जा रहा है कि दुनिया के सबसे अहम समुद्री ट्रेड रूट में शामिल होर्मुज अगर जल्द नहीं खुला तो पेट्रोल,एलपीजी और एनएलजी की किल्लत और गहरा सकती है. इन्हीं चिंताओं के बीच चीन ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा दांव खेला है. चीन की प्रमुख शिपबिल्डिंग कंपनी ने समुद्र में दैत्याकार जहाज उतारने की तैयारी शुरू कर दी है. दुनिया के इस सबसे बड़े जहाज से एक ही बार में 2.71 लाख क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस यानी एनएलजी लाई जा सकेगी. यह जहाज न केवल शिपबिल्डिंग उद्योग में नया रिकॉर्ड बनाएगा, बल्कि वैश्विक गैस सप्लाई चेन को भी नई मजबूती देगा। 

क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?
हाल के महीनों में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने दुनिया को यह एहसास कराया कि तेल-गैस की सप्लाई कितनी संवेदनशील है. दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा और LNG की महत्वपूर्ण खेपें इसी रास्ते से गुजरती हैं. ऐसे में होर्मुज की नाकेबंदी से एशिया और यूरोप के कई देशों में गैस की कमी पैदा हो गई है। 

यही वजह है कि LNG परिवहन क्षमता बढ़ाने को अब ऊर्जा सुरक्षा का हिस्सा माना जा रहा है. चीन का नया जहाज इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो एक बार में पहले की तुलना में कहीं ज्यादा LNG ढो सकेगा। 

कितना विशाल है यह जहाज?
नया LNG कैरियर 344 मीटर लंबा होगा और इसकी क्षमता 2,71,000 क्यूबिक मीटर LNG होगी. तुलना करें तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक LNG जहाजों की क्षमता करीब 1,70,000 से 1,80,000 क्यूबिक मीटर होती है. एक आधुनिक गैस कैरियर औसतन करीब 174,000 क्यूबिक मीटर LNG लेकर चलता है। 

इस लिहाज से चीन का नया जहाज मौजूदा मानक जहाजों की तुलना में लगभग 57 प्रतिशत अधिक LNG ढो सकेगा. इसका मतलब है कि एक ही यात्रा में अधिक गैस पहुंचाई जा सकेगी, जिससे परिवहन लागत कम होगी और सप्लाई चेन अधिक प्रभावी बनेगी। 

एलएलजी जहाज क्यों कहलाते हैं ‘क्राउन ज्वेल’?
LNG कैरियर बनाना आज भी बेहद जटिल है. प्राकृतिक गैस को -162 डिग्री सेल्सियस पर तरल रूप में सुरक्षित रखना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. इसके लिए विशेष टैंक, उन्नत इंसुलेशन सिस्टम और अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीकों की जरूरत होती है. यही वजह है कि इसे शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री का ‘क्राउन ज्वेल’ यानी सबसे प्रतिष्ठित जहाज माना जाता है। 

ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के इस नए जहाज में NO96 Super+ मेम्ब्रेन कंटेनमेंट सिस्टम लगाया जाएगा, जो गैस को सुरक्षित रखने के साथ-साथ रिसाव और ऊर्जा हानि को भी कम करेगा। 

पर्यावरण के लिहाज से भी खास
जहाज में डुअल-फ्यूल इंजन सिस्टम होगा, जिससे यह पारंपरिक ईंधन और एलएनजी दोनों पर चल सकेगा. कंपनी का दावा है कि इससे ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन दोनों कम होंगे. यह जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के Tier-III पर्यावरण मानकों का भी पालन करेगा। 

ऐसे समय में जब दुनिया हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, LNG को कोयले और तेल की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है. इसलिए LNG परिवहन क्षमता बढ़ना एनर्जी ट्रांजिशन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। 

समुद्र में चीन की बढ़ती ताकत
एक समय एलएनजी जहाज निर्माण पर दक्षिण कोरिया और कुछ पश्चिमी कंपनियों का लगभग एकाधिकार था. लेकिन अब चीन तेजी से इस क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक एनएलजी शिपबिल्डिंग बाजार में चीन की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। 

चीन अखबार के मुताबिक, हुडोंग-झोंगहुआ शिपबिल्डिंग कंपनी के पास फिलहाल लगभग 60 LNG जहाजों के ऑर्डर हैं और उसके शिपयार्ड 2030 तक पूरी तरह बुक बताए जा रहे हैं. इससे साफ है कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार में चीन अपनी भूमिका और मजबूत करना चाहता है। 

होर्मुज संकट और एनएलजी का भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव बना रहता है तो LNG परिवहन क्षमता दुनिया के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी. यूरोप, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे बड़े आयातक देशों को ऊर्जा सुरक्षा के लिए अधिक बड़े और अधिक कुशल एलएनजी जहाजों की जरूरत होगी। 

ऐसे में चीन का यह मेगा एलएनजी कैरियर सिर्फ एक जहाज नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक ऊर्जा राजनीति और सप्लाई चेन की नई तस्वीर का प्रतीक माना जा रहा है. 2028 में इसकी पहली डिलीवरी होने के बाद यह दुनिया की एलएनजी लॉजिस्टिक्स क्षमता को एक नया आयाम दे सकता है। 

 

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