TMC में अंदरूनी कलह का विस्फोट, दिल्ली की बैठक से विधानसभा तक पहुंचा विवाद

कोलकाता

दिल्ली में 'संयोगवश' हुई एक मुलाकात, हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप, तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर बढ़ता असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई जैसी महज 13 दिन के भीतर तेजी से घटी इन सिलसिलेवार घटनाओं ने 28 वर्ष पुरानी पार्टी को उसके पहले विभाजन की दहलीज पर ला खड़ा किया। बंग भवन में 22 मई को तृणमूल के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बीच कथित तौर पर हुई 'संयोगवश' मुलाकात से शुरू हुआ घटनाक्रम बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से भी इसकी मान्यता हासिल कर ली। इस बगावत ने औपचारिक रूप से उस पार्टी में विभाजन की रेखा खींच दी, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे।
हार के बाद उभरने लगी थी कलह

विधानसभा चुनाव में चार मई को भाजपा के हाथों मिली हार के बाद पार्टी के भीतर कलह उभरने लगी थी। पार्टी के कुछ विधायकों को लगने लगा था कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे एवं सांसद अभिषेक बनर्जी का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे असंतोष धीरे-धीरे गहराता चला गया। नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में छह मई को ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से चुनाव अभियान में अभिषेक बनर्जी की भूमिका के लिए खड़े होकर उनका अभिनंदन करने को कहा। हालांकि इसका उद्देश्य उनके योगदान को स्वीकारना था, लेकिन पार्टी के एक वर्ग में इस कदम को लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ विधायकों को लगने लगा कि पार्टी का केंद्र धीरे-धीरे एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।
जहांगीर को अभिषेक ने क्यों नहीं किया निष्कासित?

पार्टी में असंतोष पहली बार खुले तौर पर 19 मई को सामने आया। एक अन्य बैठक में ऋतब्रत बनर्जी और इंटाल्ली के विधायक संदीपन साहा ने सवाल उठाया कि फालटा विधायक जहांगीर खान द्वारा पुन: चुनाव से हटने की सार्वजनिक घोषणा किए जाने के बावजूद पार्टी ने उन्हें निष्कासित क्यों नहीं किया। चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को व्यापक तौर पर तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया।
22 मई को ऋतब्रत ने की शुभेंदु से मुलाकात

वरिष्ठ विधायक कुणाल घोष ने भी इसी तरह की चिंताएं जताईं, हालांकि बाद में उन्होंने खुद को बागी खेमे से अलग कर लिया। घटनाक्रम ने तीन दिन बाद निर्णायक मोड़ लिया। ऋतब्रत बनर्जी राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए 22 मई को दिल्ली गए हुए थे तभी वह दोपहर के भोजन के लिए बंग भवन पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हो गई। इसके बाद ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित करने के शुभेंदु अधिकारी के फैसले का स्वागत किया और इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा बताया। उनके इस बयान ने तत्काल राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी

हालांकि, कुछ ही दिन में तृणमूल एक अलग विवाद में घिर गई। 25 मई को आरोप सामने आए कि विधानसभा में विधायक दल के नेतृत्व ढांचे से जुड़े दस्तावेजों पर कई विधायकों के जाली हस्ताक्षर कर विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए थे। इस आरोप ने पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी तथा पार्टी के भीतर जारी खींचतान को खुले टकराव में बदल दिया। इस विवाद ने 27 मई को कानूनी मोड़ ले लिया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से औपचारिक शिकायत कर हस्ताक्षरों की जालसाजी का आरोप लगाया। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने मामले को पुलिस के संज्ञान में दिया, जिसके साथ ही अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) की ओर से जांच शुरू हो गई।
अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला

अगले दो दिन के दौरान जब जांचकर्ताओं ने विधायकों से पूछताछ शुरू की, तो मामला महज एक प्रक्रियागत विवाद तक सीमित नहीं रहा बल्कि तेजी से राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। यह राजनीतिक सकंट 30 मई को उस समय और गहरा गया, जब अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ ने हमला कर दिया। यद्यपि सभी राजनीतिक दलों ने इस घटना की निंदा की, लेकिन तृणमूल के कई नेताओं ने निजी तौर पर संगठन और विधायक दल के कुछ वर्गों की अपेक्षाकृत फीकी प्रतिक्रिया पर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यह नेतृत्व और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के एक हिस्से के बीच बढ़ती दूरी का संकेत था।
ममता की बैठक में पहुंचे कम विधायक

इसके बाद 31 मई तक नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ती साफ दिखाई देने लगी। ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई, लेकिन उसमें अपेक्षा से कम उपस्थिति रही। निर्णायक रूप से विभाजन एक जून को मुख्यमंत्री शुभेंदु द्वारा सार्वजनिक रूप से यह खुलासा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद सामने आया कि सीआईडी जांच रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर शुरू हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन संकट को थामने के बजाय इस कदम ने बगावत को और तेज कर दिया।
'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस'

देखते ही देखते बागी खेमे के भीतर इस मुहिम को एक नाम भी मिल गया-'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस'। यह राजनीतिक नाटक बुधवार को चरम पर पहुंच गया जब 58 विधायकों के एक समूह ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुने जाने और नई टीम के गठन की जानकारी दी। विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। कुछ ही मिनट बाद इन्हीं में से कई विधायक राज्य सचिवालय 'नबान्न' में शुभेंदु अधिकारी द्वारा बुलाई गई सरकारी समीक्षा बैठक में भी शामिल हुए।
अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार

दिल्ली में शुरू हुई यह बगावत, जिसने हस्ताक्षर जालसाजी के आरोपों, संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई के सहारे रफ्तार पकड़ी थी, उसका अंतिम और निर्णायक अध्याय आखिरकार विधानसभा के भीतर ही लिखा गया। ममता बनर्जी के व्यक्तित्व और राजनीतिक प्रभुत्व के इर्द-गिर्द खड़ी हुई पार्टी ने महज 13 दिन में अपने अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार देखी।

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