क्या फिर आने वाली है आर्थिक मंदी? एक्सपर्ट्स ने जताई चिंता, भारत के लिए क्या हैं संकेत

नई दिल्ली
 दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाओं और जाने-माने अर्थशास्त्रियों ने पिछले एक हफ्ते में वैश्विक आर्थिक मंदी को लेकर गंभीर चेतावनियां जारी की हैं. इसके पीछे मुख्य वजहें हैं अमेरिका की आक्रामक टैरिफ पॉलिसी, ट्रेड वॉर का बढ़ता असर, कमजोर होता उपभोक्ता खर्च और AI निवेश में बने बुलबुले के फटने का डर. मुख्य तौर पर अमेरिका में इसका सबसे ज्यादा रिस्क है, मगर भारत समेत दुनिया के बाकी देश भी इससे अधूते नहीं रहने वाले। 

सबसे बड़ी चेतावनी मेरिल लिंच (Merrill Lynch) के दिग्गज फोरकास्टर गैरी शिलिंग (Gary Shilling) की तरफ से आई है. ये वही शख्स हैं, जिन्होंने 1969-70 के दौर की आर्थिक मंदी की सटीक भविष्यवाणी की थी और इनका नाम हर किसी को याद हो गया था. हाल ही में बिजनेस इनसाइड को दिए इंटरव्यू में शिलिंग ने कहा कि 2026 के अंत तक अमेरिकी मंदी ‘लगभग तय’ है. उनके मुताबिक तीन बड़े खतरे हैं. पहला एक फ्रीज हो चुका हाउसिंग मार्केट, जहां खरीदार और विक्रेता दोनों सुस्त पड़े हैं, दूसरा कॉर्पोरेट कैपेक्स में तेज गिरावट, और कमजोर होता उपभोक्ता वर्ग. शिलिंग ने कहा, “शेयर बाजार बहुत महंगा है और जल्द ही बड़ा करेक्शन आने की पूरी आशंका है। 

उनके अलावा, बिलेनियर निवेशक लियोन कूपरमैन (Leon Cooperman) भी शिलिंग के सुर में सुर मिला चुके हैं. फॉक्स बिजनेस पर उन्होंने कहा, “बाजार बहुत ऊंचे मूल्यांकन पर है और कई समस्याएं एक साथ मुंह बाए खड़ी हैं। 

जेपी मॉर्गन (JP Morgan) ने पहले वैश्विक मंदी की 60 फीसदी संभावना जताई थी, जिसे अब घटाकर 40 फीसदी किया है. लेकिन साथ ही यह भी कहा कि “काफी डाउनसाइड रिस्क अभी भी बना हुआ है। 

मैकिंजी (McKinsey) के ताजा ग्लोबल सर्वे का नतीजा और भी चौंकाने वाला है. करीब 70% बिजनेस एग्जीक्युटिव्स ने मंदी के किसी न किसी सीन को सबसे संभावित माना. इनमें से 61 प्रतिशत ने डिमांड से पैदा होने वाली मंदी की बात कही. यानी बढ़ती अनिश्चितता से उपभोक्ताओं का भरोसा टूट सकता है, जो मंदी तक ले जाने के लिए काफी होगा। 

मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) के चीफ ग्लोबल इकॉनमिस्ट सेथ कारपेंटर (Seth Carpenter) ने कहा, “आर्थिक नुकसान शुरू हो चुका है. अगर टैरिफ अप्रैल के पीक पर वापस जाते हैं तो अमेरिका और पूरी दुनिया मंदी में चली जाएगी.” IMF ने भी ग्लोबल ग्रोथ 2024 के 3.3% से घटकर 2026 में 3.1% रहने का अनुमान जताया है और कहा है कि जोखिम नीचे की तरफ झुके हुए हैं। 

भारत पर क्या होगा असर?
भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः घरेलू मांग पर टिकी है, इसीलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि देश वैश्विक मंदी की सीधी चपेट में नहीं आएगा. डेलॉयट इंडिया (Deloitte India) के अनुसार भारत 2026 में 6.5 से 7 फीसदी की दर से बढ़ता रह सकता है और वह दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा. लेकिन बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) के चीफ इकॉनमिस्ट मदन सबनवीस (Madan Sabnavis) की चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उनके मुताबिक भारत रुपये की तेज अस्थिरता से जरूर प्रभावित होगा. जब अमेरिका और यूरोप जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में मंदी आती है, तो निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी खींच लेते हैं, परिमाणस्वरूप रुपया कमजोर पड़ता है, शेयर बाजार में उठापटक होती है और आयात होने वाले कच्चे माल महंगे हो जाते हैं. भारत कच्चे तेल का बड़ा इम्पोर्टर है, इसलिए वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोई भी उथलपुथल सीधे महंगाई को हवा दे सकती है। 

IT सेक्टर पर बड़ा खतरा
एक बड़ा सेक्टोरल खतरा आईटी इंडस्ट्री के सामने है. नैस्कॉम (NASSCOM) की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय आईटी सेक्टर की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप जैसे पश्चिमी बाजारों पर टिकी हुई है. यदि इन देशों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है और वहां सेवाओं की मांग घटती है, तो इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा. नए प्रोजेकट्स मिलना कम हो जाएंगे, कंपनियां अपने बजट में कटौती करेंगी और युवाओं के लिए नई नौकरियों के अवसर भी सिमट सकते हैं। 

आईटी के अलावा कपड़ा, टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग जैसे वे तमाम उद्योग भी दबाव महसूस करेंगे, जो अपना माल विदेशों में बेचते हैं. हालांकि, भारत के पास इस संभावित संकट से लड़ने के मजबूत साधन भी मौजूद हैं. सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) पर किया जा रहा भारी निवेश और भारतीय रिजर्व बैंक की संभली हुई नीतियां एक सुरक्षा कवच का काम करेंगी. इसके बावजूद, यदि वैश्विक आर्थिक हालात और अधिक बिगड़ते हैं, तो भारत की कुल विकास दर (GDP) में 0.3% से 0.5% तक की गिरावट देखने को मिल सकती है। 

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