जेपी अस्पताल विवाद पर डिप्टी सीएम का कड़ा रुख: CMHO से रिपोर्ट मांगी, तीन साल से बंद प्रसव सुविधा पर नहीं हुई कार्रवाई

भोपाल 

भोपाल के जेपी अस्पताल में तीन साल से बंद प्रसव सुविधा का मामला अब सरकार के उच्च स्तर तक पहुंच गया है। डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने सीएमएचओ से इस पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट एक सप्ताह में मांगी है। 
मामला सामने आने के बाद डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल ने सीएमएचओ से पूरी जानकारी तलब की है। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि एक सप्ताह के भीतर पूरे प्रकरण की समीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। सीएमएचओ डॉ. मनीष शर्मा ने कहा कि मामला वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में है और जल्द ही इस पर निर्णय लिया जाएगा। डिप्टी सीएम ने स्पष्ट किया है कि रिपोर्ट मिलने के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी, जिससे अब इस लंबे समय से लंबित विवाद पर फैसला होने की उम्मीद बढ़ गई है।

तीन साल पहले बंद हुई प्रसव सुविधा
जेपी अस्पताल, जिसे प्रदेश का मॉडल जिला अस्पताल माना जाता है, वहां वर्ष 2022 में बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया गया। स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग और शिशु रोग विभाग को यहां से हटाकर काटजू सिविल अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया। इसके बाद से जेपी अस्पताल में प्रसव सुविधा पूरी तरह बंद हो गई। यही निर्णय विवाद की जड़ बना। खास बात यह है कि जिला अस्पताल होने के बावजूद यहां प्रसव सुविधा का बंद होना आईपीएचएस गाइडलाइन के भी विपरीत माना जा रहा है।

कर्मचारियों और संगठनों के पत्र, फिर भी नहीं हुई सुनवाई
इस फैसले के बाद जेपी अस्पताल के कर्मचारियों और विभिन्न संगठनों ने कई बार पत्र लिखकर इस निर्णय को निरस्त करने की मांग की। इन पत्रों में अस्पताल की उपयोगिता, मरीजों की परेशानी और नियमों का हवाला दिया गया, लेकिन विभाग स्तर पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। लगातार पत्राचार के बावजूद कार्रवाई न होने से कर्मचारियों में असंतोष भी बढ़ा है।

रोज 50 से ज्यादा मरीज, फिर भी सुविधा नहीं
जेपी अस्पताल में आज भी रोजाना 50 से अधिक महिलाएं जांच के लिए पहुंचती हैं। लेकिन इमरजेंसी की स्थिति में उन्हें काटजू अस्पताल रेफर करना पड़ता है। इस दौरान देरी होने से कई मामलों में मरीजों की हालत बिगड़ने का खतरा रहता है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।

पहले 30 डिलीवरी रोज, अब संसाधन बेकार
पहले जेपी अस्पताल में रोजाना करीब 30 डिलीवरी होती थीं और 150 बिस्तरों का स्त्री एवं प्रसूति विभाग संचालित था। शिशु रोग विभाग में भी 60 बेड की सुविधा थी। वर्तमान में ये संसाधन मौजूद होने के बावजूद उपयोग नहीं हो पा रहे हैं, जिससे अस्पताल की क्षमता प्रभावित हो रही है।

काटजू अस्पताल पर बढ़ा दबाव, सीमित क्षमता
दूसरी ओर काटजू अस्पताल में मेटरनल एंड चाइल्ड केयर यूनिट विकसित की गई है, लेकिन वहां प्रतिदिन केवल 20 डिलीवरी ही हो पा रही हैं। 300 बेड की योजना पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है और ब्लड बैंक जैसी सुविधाओं की कमी भी सामने आई है। ऐसे में पूरा दबाव वहां शिफ्ट होने से व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

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