परिसीमन बिल पर बदले सियासी गणित! TMC-DMK की हलचल के बीच BJP की राह कितनी आसान हुई?

 नई दिल्ली

केंद्र की बीजेपी सरकार को विधानसभा चुनावों के बीच बड़े जोर का झटका लगा था. लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल गिर गया था. कांग्रेस के विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण राहुल गांधी भले ही क्रेडिट लें, लेकिन असल बात तो यह है कि तब तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 

तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के नए सिरे से जिक्र की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि दोनों ही दल अपने अपने राज्यों में सत्ता से बेदखल हो गए हैं. और, बेदखल ही नहीं हुए हैं. विधायकों के बाद टीएमसी के सांसद भी बगावत पर उतर आए हैं, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मॉनसून सत्र में मिल सकता है। 

रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी मॉनसून सत्र में फिर से महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन विधेयक संसद में पेश कर सकती है – सवाल यह है कि बदले राजनीतिक हालात में दोनों विधेयकों के पास होने की कितनी संभावना है। 

मॉनसून सेशन में महिला आरक्षण – परिसीमन बिल की संभावना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीते 12 साल के कार्यकाल में पहला मौका था जब केंद्र सरकार की तरफ से पेश कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में गिरा हो. संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए कानून में संशोधन और परिसीमन विधेयक के समर्थन में 298 मत पड़े, जबकि बिलों के विरोध में 230 मत पड़े थे. दरअसल, महिला आरक्षण लागू करने के लिए लोकसभा क्षेत्रों की संख्या फिर से निर्धारित करने के मकसद से लाया गया परिसीमन विधेयक भी महिला आरक्षण संशोधन के साथ जुड़ा हुआ था। 

बीजेपी वैसे तो विधानसभा चुनावों के बीच मिले जोरदार झटके की पूरी तरह भरपाई कर चुकी है, लेकिन नेतृत्व को मिशन तब तक अधूरा लग रहा होगा, जब तक कि दोनों विधेयक संसद से पास नहीं हो जाते – और यही वजह है कि बीजेपी सरकार मॉनसून सत्र में फिर से दोनों बिल लाने और उन्हें पास कराने के लिए प्रयासरत है। 

पश्चिम बंगाल की चुनावी जीत का तो बीजेपी को लंबे समय से इंतजार था. कई बार के गंभीर प्रयासों के बाद जीत संभव भी हो पाई. तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के साथ भले ही थलपति विजय की सरकार बन गई हो, लेकिन डीएमके की हार तो बीजेपी को सुकून देने वाली ही है. AIADMK अगर सत्ता में लौट पाती तो गठबंधन पार्टनर बीजेपी के लिए और अच्छी बात होती. डीएमके ने तो संसद में बिल गिर जाने को वोटिंग से पहले ही जीत की तरह जश्न मनाया था, और चुनाव कैंपेन की स्ट्रैटेजी तक बदल डाली थी। 

तृणमूल कांग्रेस में जो तबाही का दौर शुरू हुआ, चल ही रहा है. डीएमके नेतृ्त्व भी सशंकित है. वैसे भी आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के छोड़कर चले जाने के बाद तो विपक्षी खेमे के शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा जो डरा हुआ न हो. खबर है कि बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों से नए सिरे से संपर्क किया है. और, इस मामले में डीएमके की तरफ से भी नरम रुख अपनाए जाने की बात सामने आई है. वैसे भी गठबंधन तोड़कर कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय की टीवीके के साथ चले जाने के बाद डीएमके नए रास्ते और समीकरण तलाशने के लिए आजाद भी हो गई है. सुनने में आया है कि डीएमके केंद्र सरकार के बिल के नए ड्राफ्ट और लिखित प्रस्ताव का इंतजार कर रही है. अचानक डीएमके के लिए पलटना तो संभव भी नहीं होगा, लेकिन बीच का रास्ता तो निकाला ही जा सकता है। 

राज्यसभा चुनाव से कितना फर्क पड़ेगा
देश के 10 राज्यों में राज्यसभा की 24 सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होने जा रहे हैं. और, इनमें से 10 सीटों पर पहले से ही बीजेपी की जीत पक्की मानी जा रही थी. अब इसमें मध्य प्रदेश से एक सीट और भी जुड़ रही है. मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद मध्य प्रदेश से बीजेपी को राज्यसभा की 3 सीटें मिलना पक्का माना जाने लगा है. गुजरात से राज्यसभा की चारों सीटें बीजेपी को मिलना पक्का है. राजस्थान से 2 सीटें मिल सकती हैं. मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश से 1-1 सीटें मिलने वाली हैं. झारखंड में नंबर कम होने के कारण बीजेपी नेता बाबूलाल मरांडी ने निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा कर रखी है। 

राज्यसभा में बीजेपी के पास 113 सांसद हैं. और, पूरे एनडीए की बात करें तो ये नंबर 148 है. फिर भी दो तिहाई बहुमत के लिए 15 सीटें कम पड़ रही हैं. राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के लिए 163 सांसदों की जरूरत पड़ती है. मुद्दे की बात यह है कि टीएमसी के दो सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है, फिर तो बहुमत का आंकड़ा भी घट जाएगा. टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बाद सुष्मिता देव ने भी इस्तीफा दे दिया है. सुष्मिता देव ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से मुलाकात भी की है, जिससे आगे का प्लान स्पष्ट हो गया है। 

लोकसभा में बदल रहा नंबर गेम
बदले माहौल में लोकसभा में नंबर गेम भी बदल रहा है. तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की बगावत के बाद तो पक्का ही हो गया है. टीएमसी के बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में स्पीकर को अलग बैठने और अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए पत्र भी दे दिया है। 

काकोली घोष दस्तीदार को नेता मानने वाले ऐसे ही 19 सांसदों की लिस्ट सामने आई है, जिनमें यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा  के साथ सयानी घोष का नाम भी शामिल है. जिस तरह से काकोली घोष प्रशासनिक मीटिंग में इलाके के विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ शामिल हुई थीं, इरादे तभी साफ हो गए थे। 

अब अगर डीएमके सपोर्ट के लिए तैयार हो जाए, और टीएमसी के बागी सांसदों का साथ हो जाए तो बीजेपी के लिए दोनों बिल पास कराना आसान हो जाएगा. अगर कुछ कम पड़ा तो उसे भी मैनेज करने की कोशिश हो ही सकती है। 

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