लड़े कोई, भुगते भारत! आर्थिक-रणनीतिक संकट में फंसने की 4 वजहें और आगे का रास्ता

नई दिल्ली

भारत आर्थिक तौर पर संकट के दौर से गुजर रहा है. कारण सबको पता है, मिडिल-ईस्ट में तनाव. हालात ये हैं कि भारत के लोग सुबह उठकर सबसे पहले नजर डालते हैं कि दुनिया में कच्चा तेल और युद्ध को लेकर क्या अपडेट्स हैं। 

दरअसल, दुनिया के किसी कोने में कोई मिसाइल दागता है, दो देश आपस में टकराते हैं, या कोई बड़ा देश कमजोर देश पर पाबंदियां लगाता है, तो उसकी सीधी मार भारत की जेब पर पड़ती है. यानी करे कोई, और भुगते कोई. यह सिस्टम हर भारतीय को चुभता है। 

रूस-यूक्रेन का युद्ध हो, या फिलहाल अमेरिका और ईरान की जंग. तबाही का मंजर भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखा है? जबकि इस दौरान अमेरिकी शेयर बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई के आसपास बना हुआ है, भारत का बाजार ही पस्त नहीं है, बल्कि जीडीपी की रफ्तार थमने वाली है। 

अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों दुनिया की हर जंग का बिल भारत को चुकाना पड़ता है, इसके पीछे के असली कारण क्या हैं और इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता क्या है. ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है, और इसके पीछे कोई इत्तेफाक है, मुख्यतौर पर फिलहाल 4 कारण सामने दिख रहे हैं। 

1. कच्चा तेल (भारत की मजबूरी)
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. यानी एक तरह से भारत की इकोनॉमी तेल पर टिकी है. जब भी पश्चिम एशिया में तनाव होता है, हॉर्मुज जैसे समुद्री रास्तों पर संकट आता है, तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं, और भारत कुछ नहीं कर पाता है। 

जबकि अमेरिका का गणित अलग है. अमेरिका अब सिर्फ तेल खरीदता नहीं है, वह दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक भी है. जब तेल महंगा होता है, तो अमेरिकी कंपनियों को फायदा होता है, यानी ऐसे संकट में भी अमेरिका को कोई बड़ा आर्थिक नुकसान नहीं होता. जबकि भारत के डॉलर पानी की तरह बहने लगते हैं. इसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'आयातित महंगाई' कहते हैं, यानी महंगाई बढ़ने के कारण विदेशी फैसले होते हैं। 

2. डॉलर की दादागीरी
दुनिया में व्यवस्था ऐसी है कि भारत को कच्चा तेल खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है. जब दुनिया में अनिश्चितता बढ़ती है, तो ग्लोबल इंवेस्टर्स अपना पैसा सुरक्षित रखने के लिए डॉलर खरीदने भागते हैं. इससे डॉलर मजबूत होता है और भारतीय रुपया कमजोर पड़ जाता है. मौजूदा दौर में पिछले करीब 2 महीने से यही हो रहा है. रुपया कमजोर होने का सीधा मतलब है कि जो तेल दो महीने पहले महज 70-75 डॉलर प्रति बैरल में खरीद रहे थे, अब उसके लिए 100 डॉलर से ज्यादा का भुगतान करना पड़ रहा है. एक तो कच्चा तेल का महंगा होना, और फिर रुपया का कमजोर पड़ना, भारतीय अर्थव्यवस्था पर दोहरी चोट पहुंचाता है. इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। 

3. शेयर बाजार का गणित
वैश्विक तनाव के दौरान हमेशा भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आती है, और उसकी वजह भी विदेशी निवेशक (FII) ही होते हैं. जबकि ऐसे संकट के समय में अमेरिका बच जाता है. क्योंकि अमेरिका को दुनिया का 'सेफ हेवन' माना जाता है. जैसे ही दुनिया में युद्ध जैसी स्थिति बनती है, विदेशी निवेशक भारत जैसे 'इमर्जिंग मार्केट्स' से अपना मुनाफा समेटते हैं और उस पैसे को निकालकर अमेरिका के सरकारी बॉन्ड्स या अमेरिकी शेयर बाजार में लगा देते हैं. जिसका नतीजा ये होता है कि भारत का बाजार गिर जाता है और अमेरिका का बाजार मजबूती से डटा रहता है। 

4. तनाव का एक्सपोर्ट पर सीधा असर
भारत इंजीनियरिंग गुड्स, टेक्सटाइल और केमिकल्स जैसी कई चीजें एक्सपोर्ट करता है. लेकिन जब समुद्री रास्तों पर युद्ध का साया होता है, तो एक्सपोर्ट बाधित हो जाता है, या फिर जहाजों की आवाजाही दूसरे लंबे रूटों से करनी पड़ती है. इससे जहाजों का किराया और इंश्योरेंस का प्रीमियम 3 से 4 गुना बढ़ जाता है. फिर विदेशी बाजारों में पहुंचते-पहुंचते इनमें आयात किया जाने वाला सामान काफी महंगा हो जाता है, प्रोडक्ट महंगा होने की वजह से बिक्री घट जाती है. यानी कुल मिलाकर एक्सपोर्ट ठप पड़ जाता है और देश में आने वाली विदेशी करेंसी कम हो जाती है। 

जब ये सारे संकट एक साथ आते हैं, तो देश की विकास दर यानी जीडीपी की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है, भारत चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता, क्योंकि घरेलू मोर्चे पर किसी तरह का कोई संकट नहीं होता है. केवल एक तेल महंगा होने से माल ढुलाई महंगी होती है. जिससे सब्जी, दूध, राशन से लेकर हर चीज के दाम बढ़ते हैं. फिर महंगाई को काबू करने के लिए रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ती हैं. ब्याज दरें बढ़ते ही होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन महंगे हो जाते हैं। 

फिर जब लोन महंगा होगा और जेब में पैसा कम बचेगा. आम आदमी नया घर, गाड़ी या मोबाइल चाहकर भी नहीं खरीद पाएगा. जब लोग नहीं खरीदेंगे तो फैक्ट्रियों में सामान नहीं बनेगा. फैक्ट्रियों में सामान नहीं बनेगा, तो नई नौकरियां नहीं आएंगी. जिससे जीडीपी की रफ्तार अपने आप सुस्त पड़ जाएगी। 

इस चक्रव्यूह से बचने के लिए भारत को क्या करना चाहिए?
ये तो साफ है कि इस संकट के लिए दुनिया को कोसने से कुछ नहीं होगा. भारत को अगर वाकई में आत्मनिर्भर बनना है, तो कुछ मोर्चों पर युद्ध स्तर पर काम करना होगा। 

ऊर्जा पर विदेशी निर्भरता कम 
जब तक हम तेल के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर रहेंगे, हमारी नब्ज उनके हाथ में रहेगी, और ऐसे झटके लगते रहेंगे. हमें पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता को तेजी से कम करना होगा. गाड़ियों को इलेक्ट्रिक पर शिफ्ट करना और पेट्रोल में E30 यानी 30 फीसदी तक एथेनॉल मिलाना होगा. सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन के मामले में भारत को इतनी आत्मनिर्भरता हासिल करनी होगी कि हमें बाहर से कच्चा तेल मंगाने की जरूरत सिर्फ पेट्रोकेमिकल्स के लिए पड़े, न कि ईंधन के लिए। 

इसके अलावा भारत को 'डी-डॉलरइजेशन' यानी डॉलर की दादागीरी को कम करने की दिशा में सोचना पड़ेगा. रूस, यूएई, ईरान या जिन भी देशों के साथ भारत व्यापार करता है. उनसे सीधे 'रुपया-रुबल' या 'रुपया-दिरहम' में ट्रेड सेटलमेंट को बढ़ावा देना होगा. अगर भारत कच्चा तेल रुपये में खरीदने में कामयाब हो जाता है, तो दुनिया के किसी भी युद्ध से फॉरेक्स रिजर्व पर कोई आंच नहीं आएगी। 

घरेलू निवेशकों को 'सुपरपावर' बनाना
भारतीय शेयर बाजार को मजबूत करना होगा, फिर विदेशी निवेशक आते-जाते रहेंगे, और उसका कोई खास असर नहीं होगा. इसका एक अच्छा उदाहरण ये है कि पिछले करीब एक साल से विदेशी निवेशक जमकर बिकवाली कर रहे हैं, उसके बावजूद बाजार एक दायरे में बना हुआ है, ये ताकत मार्केट को रिटेल निवेशकों से मिली है। 

'चाइना प्लस वन' का पूरा फायदा उठाना होगा
मौजूदा हालात में भारत को सिर्फ सर्विसेज (IT) के भरोसे नहीं बैठना है, 'मेक इन इंडिया' और PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम्स को और कड़ा करके भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का ऐसा हिस्सा बनाना होगा ताकि दुनिया भारत के बिना चल ही न सके. जब दुनिया की बड़ी कंपनियों के कारखाने भारत में होंगे, तो वैश्विक तनाव के समय भी विदेशी फंड भारत से पैसा निकालने की हिम्मत नहीं करेंगे। 
 

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