धोनी से पहले इस दिग्गज ने बदली थी वनडे क्रिकेट की सोच

नई दिल्ली

क्रिकेट इतिहास में कई महान बल्लेबाज आए, लेकिन कुछ खिलाड़ियों ने खेल की दिशा ही बदल दी. माइकल बेवन उन्हीं चुनिंदा क्रिकेटरों में शामिल हैं, जिन्हें दुनिया का पहला 'असली फिनिशर' माना जाता है. आज क्रिकेट जगत में 'फिनिशर' शब्द बेहद आम हो चुका है, लेकिन इस भूमिका को पहचान दिलाने का सबसे बड़ा श्रेय माइकल बेवन को जाता है. दबाव में शांत रहकर मैच खत्म करना, विकेट बचाए रखना और आखिरी ओवर तक टीम को जीत दिलाना- बेवन ने वनडे इंटरनेशनल (ODI) में इस कला को नई ऊंचाई दी. बेवन 8 मई (शुक्रवार) को 56 साल के हो गए.

माइकल बेवन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लिमिटेड ओवर्स बल्लेबाजों में गिने जाते हैं. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के लिए 232 ओडीआई मुकाबलों में 53.58 की औसत से 6912 रन बनाए, जिसमें 6 शतक और 46 अर्धशतक शामिल रहे. बेवन ओडीआई में 67 मौकों पर नाबाद लौटे. उनका औसत उस दौर में बेहद असाधारण माना जाता था. संन्यास के वक्त वह दुनिया के उन गिने-चुने बल्लेबाजों में शामिल थे, जिनका ओडीआई औसत 50 से ऊपर था.

बाएं हाथ के बल्लेबाज माइकल बेवन की सबसे बड़ी ताकत थी- दबाव में भी शांत रहना. जब भी ऑस्ट्रेलियाई टीम मुश्किल में फंसती, तब बेवन क्रीज पर टिककर मैच को अंत तक ले जाते और टीम को जीत दिलाते. उनकी बल्लेबाजी में चौके-छक्कों की चमक कम, लेकिन मैच जिताने की क्षमता सबसे ज्यादा थी. गैप में शॉट खेलना, तेजी से रन लेना और सही समय पर बाउंड्री लगाना उनकी खास पहचान बन गया था.

माइकल बेवन ने अपने करियर में कई ऐसी पारियां खेलीं जो आज भी क्रिकेट इतिहास का हिस्सा हैं. 1996 में सिडनी में वेस्टइंडीज के खिलाफ और 2002 में मेलबर्न में न्यूजीलैंड के विरुद्ध उनकी मैच जिताऊ पारियां आज भी याद की जाती हैं. इन मुकाबलों में बेवन ने निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ मिलकर आखिरी ओवर्स में ऑस्ट्रेलिया को यादगार जीतें दिलाई थी. बेवन करीब एक दशक तक ऑस्ट्रेलिया की वनडे टीम का सबसे अहम हिस्सा रहे. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को दो वनडे वर्ल्ड कप (1999 और 2003) जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

टेस्ट क्रिकेट में नहीं चला बल्ला
वनडे क्रिकेट में महान सफलता पाने के बावजूद माइक बेवन टेस्ट क्रिकेट में वैसा असर नहीं छोड़ सके. उन्होंने 18 टेस्ट मैचों में 29.07 के एवरेज 785 रन बनाए, जिसमें 6 अर्धशतक शामिल रहे. पाकिस्तान के खिलाफ डेब्यू सीरीज में 82, 70 और 91 रनों की पारियां खेलकर शानदार शुरुआत की थी, लेकिन बाद में शॉर्ट बॉल के खिलाफ कमजोरी सामने आ गई. दिलचस्प बात यह रही कि घरेलू क्रिकेट में उन्हें शॉर्ट बॉल से ज्यादा परेशानी नहीं होती थी, लेकिन इंटरनेशनल स्तर पर यह कमजोरी उनके टेस्ट करियर पर भारी पड़ गई.

माइकल बेवन सिर्फ बल्लेबाज नहीं थे. वह बेहतरीन फील्डर भी थे और उनकी लेफ्ट आर्म रिस्ट स्पिन गेंदबाजी कई बार टीम के काम आई. उनकी गेंदबाजी कभी-कभी अनियमित जरूर रहती थी, लेकिन जरूरत पड़ने पर वह अहम विकेट निकालने की क्षमता रखते थे. बेवन ने इंटरनेशनल क्रिकेट में कुल 65 विकेट झटके.

करियर के आखिर में इंजरी से रहे परेशान
ऑस्ट्रेलियाई टीम से बाहर होने के बाद भी माइकल बेवन का बल्ला शांत नहीं हुआ. उन्होंने तस्मानिया के लिए 2004-05 के सीजन में रिकॉर्ड 1464 रन बनाए, जिसमें 8 शतक शामिल थे. उस सीजन में उनका औसत 97.60 रहा, जो किसी सपने जैसा था. करियर के आखिरी वर्षों में बेवन घुटने, कूल्हे और एड़ी की चोटों से जूझते रहे, शरीर लगातार जवाब दे रहा था और आखिरकार जनवरी 2007 में उन्होंने क्रिकेट को अलविदा कह दिया.

टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को दुनिया के सबसे महान फिनिशर्स में गिना जाता है, लेकिन उससे पहले माइकल बेवन ने इस भूमिका की नींव रखी थी. बेवन ने साबित किया कि क्रिकेट सिर्फ ताकत का खेल नहीं है, बल्कि धैर्य, दिमाग और सही फैसलों का भी खेल है. बेवन सिर्फ रन मशीन नहीं थे, बल्कि ओडीआई क्रिकेट की नई सोच के प्रतीक थे.

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