भोरमदेव अभयारण्य में बाघों के लिए गांवों को खाली किया जाएगा, प्राकृतिक धरोहर बचाने की पहल शुरू

रायपुर 
छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्र में एक बड़ा और दूरगामी फैसला आकार ले रहा है। भोरमदेव अभयारण्य को टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित करने की दिशा में सरकार ने ठोस कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इस योजना का सबसे अहम हिस्सा है-अभयारण्य के भीतर बसे गांवों का पुनर्वास। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।

वन विभाग द्वारा तैयार की गई योजना के तहत भोरमदेव अभ्यारण्य में लगभग 34 किलोमीटर लंबा जंगल सफारी मार्ग विकसित किया गया है। सफारी के दौरान पर्यटक गौर, चीतल, सांभर, भालू और जंगली सुअर जैसे वन्यप्राणियों को उनके प्राकृतिक आवास में नजदीक से देख सकेंगे। यह मार्ग मैकल पर्वतमाला के घने जंगलों से होकर गुजरता है, जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है।

सकरी नदी मार्ग बनेगा विशेष आकर्षण
इस जंगल सफारी की सबसे बड़ी खासियत सकरी नदी मार्ग है। सफारी के दौरान पर्यटकों को करीब 17 बार नदी पार करने का रोमांचक अनुभव मिलेगा। यह अनोखा सफर रोमांच और प्रकृति प्रेमियों दोनों के लिए खास आकर्षण साबित होगा। इस परियोजना में स्थानीय ग्रामीणों की सहभागिता को प्राथमिकता दी गई है। सफारी वाहनों का संचालन वन प्रबंधन समिति थंवरझोल द्वारा किया जाएगा, जिससे क्षेत्र के ग्रामीणों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए दोहरा आकर्षण
जंगल सफारी शुरू होने के बाद भोरमदेव आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक अब ऐतिहासिक मंदिर दर्शन के साथ-साथ वन्यजीवन का रोमांच भी एक ही यात्रा में अनुभव कर सकेंगे। इससे भोरमदेव क्षेत्र को राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। वन विभाग के अनुसार सुरक्षा और संचालन से जुड़ी सभी व्यवस्थाएं अंतिम चरण में हैं और जल्द ही सफारी को औपचारिक रूप से पर्यटकों के लिए खोल दिया जाएगा। 

रिजर्व फाॅरेस्ट न बनने से अभयारण्य क्षेत्र की 15 हजार से अधिक आबादी को फायदा
कुल क्षेत्र में 160 किमी का घना जंगल एनटीसीए के कहने पर काम हुआ था शुरू
भोरमदेव अभयारण्य 351.24 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसमें 160 किमी कोर एरिया यानि घने जंगल हैं। 152 वर्ग किमी बफर एरिया है। कुल 35 वन परिक्षेत्र में से भाेरमदेव और चिल्फी परिक्षेत्र मिलाकर अभयारण्य बनाते हैं। एनटीसीए (नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी) के कहने पर ही वन विभाग ने रेंगाखार, चिल्फी और कवर्धा को बांटकर बाघ के संरक्षण, संवर्धन का काम बढ़ाया था।

इसलिए कान्हा किसली के बाघ आ रहे हैं यहां, पर्यटक भी बढ़े
कान्हा किसली के जंगलों में बाघों की संख्या ज्यादा हो गई है। इस बीच पर्यटक बढ़े हैं। वन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार बाघों को वहां से ज्यादा बेहतर और सुरक्षित वातावरण यहां भोरमदेव में मिल रहा है। यहां हिरण और चीतल जैसे जानवर बड़ी संख्या में है। इसी वजह से यहां बाघ आ रहे हैं।

थंवरझोल के 37 परिवारों को शिफ्ट करने की बन चुकी थी योजना
टाइगर रिजर्व के लिए कवर्धा परिक्षेत्र के ग्राम पंचायत चौरा के आश्रित गांव थवरझोल में 37 परिवारों को उनकी अचल संपत्ति की कीमत देकर विस्थापन करने की योजना बन चुकी थी। वन विभाग ने गांव का सर्वे करा लिया था। इनके विस्थापन के आदेश भी जारी हो चुके थे। इन परिवारों को 3.70 करोड़ रुपए में जंगल से बाहर शिफ्ट किया जाता। भू- अर्जन के बदले में उन्हें 10-10 लाख रुपए दिए जाते। ताकि उनके जाने पर गांव में बाघों के रहवास के लिए सुविधाएं डेवलप कर सकें।

 

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